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भोपाल मेट्रो की दुकानों को चार महीने से नहीं मिला खरीदार: कम फुटफॉल और पार्किंग की कमी बनी वजह, अब 4,630 वर्ग मीटर के लिए नई बोली

सांकेतिक चित्र: मेट्रो स्टेशन के खाली दुकान क्षेत्र सांकेतिक चित्र

भोपाल ब्यूरो

सार: भोपाल और इंदौर के मेट्रो स्टेशनों पर कुल 4,630 वर्ग मीटर वाणिज्यिक जगह के लिए नई बोली आमंत्रित की गई है। भोपाल में पिछले चार महीनों से कोई दुकान बुक नहीं हुई है, क्योंकि कम यात्री आवाजाही और पार्किंग की कमी कारोबारियों को रोक रही है। भोपाल के दो स्टेशनों के लिए ऑनलाइन बोली 16 नवंबर तक जमा होगी और 17 नवंबर को खोली जाएगी।

भोपाल और इंदौर में मेट्रो स्टेशनों को सिर्फ सफर का ठिकाना नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों का केंद्र बनाने की योजना एक बार फिर चर्चा में है। मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने दोनों शहरों के पांच स्टेशनों पर कुल 4,630 वर्ग मीटर वाणिज्यिक जगह के लिए बोली की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। इस जगह पर दुकानें और खाने-पीने के केंद्र खुलने की योजना है। योजना का मकसद यात्रियों को स्टेशन पर ही जरूरी सुविधाएं देना और मेट्रो की किराया-भिन्न आय बढ़ाना है। लेकिन इस योजना के सामने एक बड़ी चुनौती भी खड़ी है। भोपाल में पिछले चार महीनों से मेट्रो की कोई वाणिज्यिक जगह बुक नहीं हुई है। कारोबारियों की दिलचस्पी कम रहने की वजह से निगम को अब नई बोली आमंत्रित करनी पड़ी है। यह स्थिति बताती है कि स्टेशन पर दुकान खोलना सिर्फ जगह मिलने का मामला नहीं है। इसके लिए यात्रियों की संख्या, पहुंच, पार्किंग और किराये की शर्तों का संतुलन भी उतना ही जरूरी है।

कहां, कितनी जगह के लिए बोली

भोपाल में दो स्टेशनों पर कुल 3,230 वर्ग मीटर जगह के लिए बोली आमंत्रित की गई है। बोर्ड ऑफिस चौराहा स्टेशन पर 710 वर्ग मीटर और सुभाष नगर स्टेशन पर 2,520 वर्ग मीटर जगह उपलब्ध है। इंदौर में तीन स्टेशनों पर कुल 1,400 वर्ग मीटर जगह चिह्नित की गई है। इनमें आईएसबीटी, हीरानगर और बापट स्टेशन शामिल हैं। इंदौर के आईएसबीटी स्टेशन पर करीब 1,050 वर्ग मीटर जगह है। भोपाल के दोनों स्टेशनों के लिए ऑनलाइन बोली जमा करने की अंतिम तारीख 16 नवंबर है, जबकि बोली 17 नवंबर को खोली जाएगी। इंदौर के स्टेशनों के लिए बोली की प्रक्रिया जल्द जारी होने की जानकारी दी गई है। कुल मिलाकर दोनों शहरों के पांच स्टेशनों पर यह वाणिज्यिक जगह उपलब्ध कराई जा रही है। योजना के अनुसार इन जगहों पर दुकानें और फूड आउटलेट छह महीने के भीतर शुरू हो सकते हैं। इस पहल से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 10,000 रोजगार सृजित होने का अनुमान भी जताया गया है। यह अनुमान योजना से जुड़ी रिपोर्टों में सामने आया है, और वास्तविक रोजगार इस बात पर निर्भर करेगा कि कितनी जगह वास्तव में बुक होती है और वहां किस तरह का कारोबार शुरू होता है।

पहली बोली में दिलचस्पी क्यों नहीं बदली सौदे में

भोपाल में वाणिज्यिक जगह के लिए पहली बोली प्रक्रिया जून में शुरू हुई थी। उस दौरान तीन कारोबारियों ने दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन कोई भी कारोबारी जगह लेने के लिए आगे नहीं बढ़ा। इसके बाद पिछले चार महीनों से भोपाल मेट्रो की कोई वाणिज्यिक जगह बुक नहीं हुई है। इसकी वजहों में पार्किंग सुविधा का अभाव और यात्रियों की कम आवाजाही प्रमुख बताई गई है। मेट्रो सेवाओं में रोजाना यात्रियों की संख्या कम बताई जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या रोजाना 100 से भी कम बताई गई है। यह आंकड़ा रिपोर्ट में बताए गए अनुमान के रूप में सामने आया है, और इसे मेट्रो की मौजूदा सीमित नेटवर्क स्थिति के संदर्भ में देखा जा रहा है। जब स्टेशन पर आने-जाने वाले लोगों की संख्या कम होती है, तो दुकानदार के लिए वहां से बिक्री की उम्मीद भी कम हो जाती है। पार्किंग की कमी भी एक बड़ी बाधा है। अगर ग्राहक अपने वाहन के साथ स्टेशन तक आसानी से नहीं पहुंच सकता, तो वह दुकान तक भी कम पहुंचेगा। यही वजह है कि कारोबारी जगह लेने से पहले फुटफॉल, पहुंच और किराये की शर्तों का पूरा हिसाब लगाते हैं। पहली बोली में दिलचस्पी दिखाने के बाद भी सौदा न होना इसी हिसाब-किताब का नतीजा माना जा रहा है।

सांकेतिक चित्र: मेट्रो स्टेशन पर खुला खाने-पीने का कियोस्क और प्लेटफॉर्म पर यात्री
सांकेतिक चित्र

बोली की शर्तें: दस साल का लाइसेंस, दो साल का लॉक-इन

नई बोली की शर्तों में कारोबारियों के लिए कुछ अहम बिंदु हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। चुनी गई कंपनियों को दस साल के लाइसेंस पर जगह मिलेगी। इसमें दो साल का अनिवार्य लॉक-इन होगा। लॉक-इन अवधि के दौरान कंपनियां आवंटित जगह वापस नहीं कर सकेंगी, चाहे बिक्री कम ही क्यों न रहे। लॉक-इन के बाद भी जगह छोड़ने के लिए 180 दिन पहले नोटिस देना होगा। आंशिक रूप से जगह वापस करने की अनुमति नहीं होगी। चुनी गई कंपनियों को अपना आउटलेट तैयार करने के लिए 180 दिन का समय मिलेगा। इस अवधि को फिटमेंट अवधि माना जाएगा। लाइसेंस शुल्क इसी अवधि के बाद लागू होगा, लेकिन अगर कोई कंपनी पहले ही कारोबार शुरू कर देती है, तो उसे कारोबार शुरू होने की तारीख से शुल्क देना पड़ सकता है। लाइसेंस शुल्क हर साल पांच प्रतिशत की दर से चक्रवृद्धि आधार पर बढ़ेगा। इसके अलावा जीएसटी, बिजली और पानी के शुल्क अलग से देने होंगे। निर्माण और विकास की लागत भी कंपनियों को ही वहन करनी होगी। स्टेशन पर सिर्फ अस्थायी निर्माण की अनुमति होगी, और वह भी मेट्रो निगम की मंजूरी से। शर्त यह भी है कि कारोबार से यात्रियों की आवाजाही और स्टेशन की सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।

बोर्ड ऑफिस और सुभाष नगर: धरोहर राशि और कारोबार की शर्त

भोपाल के दोनों स्टेशनों के लिए बोली की वित्तीय शर्तें अलग-अलग हैं, क्योंकि दोनों जगहों का आकार अलग है। बोर्ड ऑफिस स्टेशन पर 710 वर्ग मीटर जगह के लिए धरोहर राशि 1.20 लाख रुपये तय की गई है। इस स्टेशन के लिए बोली लगाने वाली कंपनी का न्यूनतम औसत वार्षिक टर्नओवर 86.27 लाख रुपये होना चाहिए। सुभाष नगर स्टेशन पर 2,520 वर्ग मीटर जगह के लिए धरोहर राशि 4.20 लाख रुपये है, और न्यूनतम औसत वार्षिक टर्नओवर 3.13 करोड़ रुपये तय किया गया है। दोनों जगहों पर लाइसेंस अवधि दस साल और लॉक-इन दो साल का होगा। बोली लगाने वाली कंपनियां प्रति वर्ग मीटर मासिक लाइसेंस शुल्क का प्रस्ताव देंगी, जो हर तीन महीने में अग्रिम रूप से देना होगा। यह व्यवस्था कारोबारियों के लिए शुरुआती निवेश और नियमित खर्च का स्पष्ट ढांचा देती है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाती है कि मेट्रो निगम वाणिज्यिक जगह के लिए गंभीर और आर्थिक रूप से सक्षम कारोबारियों को ही चुनना चाहता है। छोटे कारोबारियों के लिए टर्नओवर की शर्त एक चुनौती हो सकती है, जबकि बड़े ब्रांडों के लिए यह शर्त सामान्य मानी जा सकती है।

यात्रियों को स्टेशन पर क्या सुविधाएं मिलेंगी

योजना के सफल होने पर यात्रियों को स्टेशन पर ही कई रोजमर्रा की सुविधाएं मिल सकती हैं। इनमें दुकानें, खाने-पीने के केंद्र, कैफे, सुविधा स्टोर, एटीएम और ब्रांडेड शोरूम शामिल हो सकते हैं। पहले की योजनाओं में कोचिंग केंद्र, सैलून और क्लीनिक जैसी सेवाओं की भी चर्चा हुई है। मकसद यह है कि यात्री सफर के दौरान ही छोटी-मोटी खरीदारी कर सके, नाश्ता या चाय ले सके और जरूरी सेवाओं तक पहुंच सके। भोपाल-इंदौर मेट्रो में 30 अक्टूबर से स्टेशनों पर टिकट वेंडिंग मशीन से 30 सेकंड में टिकट मिलने की सुविधा भी शुरू हो चुकी है। भोपाल और इंदौर में मेट्रो नेटवर्क अभी सीमित दायरे में चल रहा है, इसलिए स्टेशन पर सुविधाओं का विस्तार यात्रियों के अनुभव को बेहतर बना सकता है। लेकिन यह भी सच है कि सुविधाओं की सफलता यात्रियों की संख्या पर निर्भर करेगी। अगर स्टेशन पर लोग कम आते हैं, तो दुकानें भी कम चलेंगी। इसलिए मेट्रो निगम के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे यात्रियों की संख्या बढ़ानी है, दूसरी तरफ वाणिज्यिक जगह को आकर्षक बनाना है। दोनों काम एक-दूसरे से जुड़े हैं। ज्यादा यात्री दुकानों के लिए ग्राहक लाएंगे, और स्टेशन पर सुविधाएं यात्रियों को मेट्रो की ओर आकर्षित कर सकती हैं।

गैर-किराया आय बढ़ाने की निगम की रणनीति

मेट्रो निगम के प्रबंध निदेशक एस कृष्णा चैतन्य ने कहा है कि निगम गैर-किराया आय बढ़ाने पर काम कर रहा है। वाणिज्यिक जगह के अलावा स्टेशन नामकरण अधिकार, घोषणाओं और विज्ञापन के लिए भी बोली जारी की गई है। यह रणनीति दुनिया भर के मेट्रो सिस्टम में आम है। किराये से होने वाली आय अक्सर परिचालन खर्च को पूरा नहीं करती, इसलिए मेट्रो निगम विज्ञापन, ब्रांडिंग, वाणिज्यिक जगह और अन्य सेवाओं से आय बढ़ाने की कोशिश करते हैं। भोपाल में पहले भी स्टेशन ब्रांडिंग और सह-नामकरण अधिकारों की पेशकश की जा चुकी है। आठ स्टेशनों के लिए ब्रांडिंग अधिकारों की बोली की चर्चा पहले भी हुई है। इन उपायों का मकसद मेट्रो को आर्थिक रूप से ज्यादा टिकाऊ बनाना है। लेकिन वाणिज्यिक जगह की बुकिंग न होना यह भी दिखाता है कि ब्रांडिंग और दुकानों के लिए बाजार की प्रतिक्रिया धीमी है। निगम को अब यह साबित करना होगा कि स्टेशन पर कारोबार करना फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए यात्री संख्या, पार्किंग और पहुंच में सुधार भी उतना ही जरूरी है, जितनी बोली की शर्तों में लचीलापन।

आगे क्या: 16-17 नवंबर की बोली पर रहेगी नजर

अब सबकी नजर 16 और 17 नवंबर पर रहेगी। भोपाल के बोर्ड ऑफिस चौराहा और सुभाष नगर स्टेशनों के लिए ऑनलाइन बोली 16 नवंबर तक जमा होगी और 17 नवंबर को खोली जाएगी। इसके बाद यह साफ होगा कि इस बार कारोबारियों की प्रतिक्रिया पहली बोली से अलग है या नहीं। इंदौर के आईएसबीटी, हीरानगर और बापट स्टेशनों के लिए बोली प्रक्रिया जल्द जारी होने की उम्मीद है। अगर भोपाल की बोली में अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है, तो यह मेट्रो की वाणिज्यिक योजना के लिए एक सकारात्मक संकेत होगा। अगर फिर से प्रतिक्रिया कम रहती है, तो निगम को शर्तों, किराये या सुविधाओं पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। यात्रियों के लिए भी यह प्रक्रिया अहम है, क्योंकि स्टेशन पर दुकानों और सुविधाओं की शुरुआत का समय इसी बोली की सफलता पर निर्भर करेगा। योजना के अनुसार छह महीने के भीतर दुकानें और फूड आउटलेट शुरू हो सकते हैं, लेकिन यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब बोली में पर्याप्त कारोबारी आगे आएं और तय समय में अपने आउटलेट तैयार करें। आने वाले दिनों में बोली की प्रक्रिया, कारोबारियों की प्रतिक्रिया और निगम के अगले कदमों पर नजर रहेगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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