इंदौर ब्यूरो
सार: इंदौर के डेली कॉलेज परिसर में बुधवार की शाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इंदौर विभाग का चरैवेति एकत्रीकरण संपन्न हुआ। शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के समारोप के रूप में आयोजित इस एकत्रीकरण में इंदौर विभाग के पाँच जिलों के स्वयंसेवकों को सह सरकार्यवाह अतुल लिमये जी ने संबोधित किया और समाज को साथ लेकर चलने का संदेश दिया।
शताब्दी वर्ष के समारोप पर विशाल एकत्रीकरण
इंदौर में बुधवार की शाम संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की शृंखला का समापन एक विशाल एकत्रीकरण के साथ हुआ। डेली कॉलेज के मैदान में स्वयंसेवक पंक्तिबद्ध रूप से एकत्र हुए और अनुशासन का एक प्रभावशाली दृश्य प्रस्तुत किया। यह एकत्रीकरण इंदौर विभाग के पाँच जिलों के स्वयंसेवकों का सामूहिक आयोजन था, जिसमें शाखाओं से आए स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का आरंभ ध्वजारोहण और संघ प्रार्थना से हुआ। इसके बाद सभी स्वयंसेवकों ने सामूहिक योग प्रदर्शन किया। मैदान में दूर तक फैली पंक्तियों और एक साथ किए गए योग ने इस आयोजन को एक विशेष पहचान दी। इसके बाद इंदौर विभाग कार्यवाह रित्नेश रघुवंशी जी ने शताब्दी वर्ष में इंदौर विभाग में हुए कार्यक्रमों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

अतुल लिमये जी का संबोधन: 100 वर्षों की यात्रा स्वयंसेवकों के परिश्रम की विजय यात्रा
स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए सह सरकार्यवाह अतुल लिमये जी ने कहा कि संघ की 100 वर्षों की यात्रा स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम की विजय यात्रा है। उन्होंने कहा कि संघ ने इन 100 वर्षों में व्यक्ति निर्माण की एक अनुपम शाखा पद्धति को विकसित किया है। शाखा से देश और समाज के लिए जीवन जीने वाले स्वयंसेवकों की एक मालिका खड़ी हुई है, साथ ही आदर्श समाज जीवन जीने वाले व्रती परिवारों की एक लंबी श्रृंखला इस देश में खड़ी हुई है।
उन्होंने संगठन की विभिन्न रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन तंत्र के साथ ही समाज जीवन में परिवर्तन करने वाली विभिन्न रचनाएं जागरण श्रेणी में खड़ी की गई हैं। सब समाज को अपनाकर चलने वाला सेवा विभाग है और प्रचार विभाग ने राष्ट्रीय विचारों के प्रचार-प्रसार की विभिन्न रचनाएं खड़ी की हैं। तीन लाख गाँवों तक जागरण पत्रिकाओं और राष्ट्रीय विचारों को प्रसारित करने के लिए विश्व संवाद केंद्र चल रहे हैं। समाज जीवन की सज्जन शक्ति को राष्ट्रीय कार्य से जोड़ने के लिए संपर्क विभाग सतत प्रयत्नशील है और समाज जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए छह विषयों की गतिविधियों की रचना खड़ी हुई है।

पंच परिवर्तन और कार्यशैली: सामूहिकता, अनुशासन, व्यक्ति निरपेक्षता
अतुल लिमये जी ने कहा कि समाज के आचरण में परिवर्तन लाने के लिए स्वयंसेवक पंच परिवर्तन का संकल्प लेकर कार्य कर रहे हैं। संघ की अभिनव कार्यशैली में सामूहिकता, अनुशासन और व्यक्ति निरपेक्षता का प्रमुख स्थान है। उन्होंने कहा कि 100 वर्षों में संगठन के व्यापक प्रसार के साथ ही संतुष्टि का भाव न आवे, ऐसी अपेक्षा है — असंतुष्टि के भाव से कार्यकर्ताओं को कार्य करना होगा। संगठन के विस्तार के साथ ही सर्व समाज में संघ भाव की व्याप्ति हो, ऐसा संकल्प करना है।
उन्होंने कहा कि शत प्रतिशत समाज तक संगठनात्मक पहुंच के साथ गुणवत्तापूर्ण कार्य बनाए रखना है। स्वयंसेवकों की निर्मिति और समाज के आचरण में परिवर्तन के लिए साथ-साथ रचनाएं खड़ी करनी होंगी। समाज का मन, देश और समाज के अनुकूल कार्य करने का हो और हमारा समाज आस्था और आत्मीयता से युक्त हो, इसके लिए समाज में विमर्श के क्षेत्र में कार्य करने वाली रचनाएं खड़ी करनी हैं। समाज का मन तैयार हो और साथ ही समाज का आचरण भी बदले, इसलिए विचार के साथ व्यवहार में भी परिवर्तन हो। विषमता का व्यवहार समाज के किसी भी घटक द्वारा न हो। सकारात्मक आचरण के लिए ही पंच परिवर्तन का संकल्प लिया गया है।

समाज को साथ लेकर चलना होगा: जगन्नाथ का रथ तभी आगे बढ़ेगा
अपने संबोधन में अतुल लिमये जी ने समाज की चुनौतियों और समस्याओं पर भी बात की। उन्होंने कहा कि हमें देश और समाज के समक्ष खड़ी समस्याओं और चुनौतियों, दोनों पर कार्य करना है। चुनौतियों पर कार्य करने के लिए शासन और समाज दोनों को साथ आना होगा, इसलिए समाज जीवन में कार्यरत 10 लाख से अधिक सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के बीच संवाद और समन्वय का कार्य करना है। उनकी क्षमता और कुशलता के अनुसार कार्य और प्रशिक्षण देने वाली रचना और कार्यशैली भी विकसित करनी है।
उन्होंने कहा कि संपूर्ण समाज को साथ में लेकर कार्य करने का स्वभाव विकसित करना है और इस सेतु संगठनात्मक अभिनिवेश से बचना भी है। व्यवस्था में परिवर्तन के लिए हिंदू जीवन मूल्यों और धर्म आधारित व्यवस्थाओं को खड़ा करना है और समाज में संस्कार देने वाली व्यवस्था खड़ी करनी है। संपूर्ण समाज में संगठन की व्याप्ति के साथ-साथ समाज में परिवर्तन और संपर्क के लिए जागरण श्रेणी तथा समस्याओं के समाधान हेतु गतिविधियों को मजबूत करना है।
अपने संबोधन के सार में उन्होंने तीन बातों पर जोर दिया — समाज के संगठन और परिवर्तन का कार्य कठिन परंतु श्रमसाध्य है, जिसे वीरव्रत से विजयी सिद्ध करना है; समाज की चुनौतियों और समस्याओं के समाधान के लिए समाज की सज्जन शक्ति के साथ कार्य करने की शैली विकसित करनी है; और समाज को भी साथ में लगना होगा, क्योंकि जगन्नाथ का रथ तभी आगे बढ़ेगा जब सबका हाथ लगेगा। उन्होंने कहा कि हमारा कार्य कठिन और परिश्रमसाध्य है, तथापि हमने वीर व्रत धारण किया है — उपेक्षा, विरोध, उत्साह और सहयोग को प्राप्त करते हुए अपने कार्य को प्रभावी से आगे बढ़कर विजयी बनाना है।

मंच: प्रांत और विभाग के पदाधिकारी, मुख्य अतिथि ने अनुशासन और देशभक्ति का महत्व बताया
कार्यक्रम के मंच पर मालवा प्रांत के प्रांत संघचालक डॉ. प्रकाश शास्त्री जी, विभाग संघचालक डॉ. मुकेश मोढ जी और मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात उद्योगपति एवं समाजसेवी प्रशांत शाह उपस्थित रहे। मंच की पृष्ठभूमि में गुरु तेगबहादुर और संत रविदास के चित्र भी प्रदर्शित किए गए थे।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रशांत शाह ने राष्ट्र निर्माण में संघ के अनुशासन और देशभक्ति के महत्व को प्रतिपादित किया। उन्होंने कहा कि अनुशासन और देशभक्ति जैसे मूल्य ही राष्ट्र निर्माण की नींव हैं और समाज जीवन में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शताब्दी वर्ष का समापन, आगे 2 नवंबर से अखिल भारतीय बैठक
इंदौर का यह एकत्रीकरण संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का समारोप बिंदु है। इससे पहले 25 अक्टूबर को इंदौर में पथ संचलन निकाला गया था और बुधवार को डेली कॉलेज का महा-एकत्रीकरण उसी शृंखला की अगली कड़ी था। शताब्दी वर्ष के दौरान संगठन ने अपने काम को समाज के सामने रखने और नई पीढ़ी से जोड़ने पर जोर दिया है।
इसके बाद 2 से 4 नवंबर तक इंदौर में ही संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक होगी, जिसमें देशभर से आए पदाधिकारी संगठन के आगामी काम, विस्तार की योजना और सामाजिक गतिविधियों पर चर्चा करेंगे। बुधवार का एकत्रीकरण इस बैठक की भूमिका के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें स्वयंसेवकों की बड़ी उपस्थिति के माध्यम से संगठन की निरंतरता और ऊर्जा का प्रदर्शन हुआ।
डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।
