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11 करोड़ किसान आईडी का लक्ष्य पांच महीने पहले पूरा: शिवराज सिंह चौहान ने किया ऐलान, अब एक ही पहचान से मिलेंगे कर्ज, बीमा और सरकारी योजनाओं का लाभ

सांकेतिक चित्र: सूर्योदय के समय हरा-भरा खेत और ट्रैक्टर सांकेतिक चित्र

नई दिल्ली। देश के किसानों के लिए डिजिटल खेती की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि दर्ज हुई है। केंद्र सरकार ने 11 करोड़ किसान आईडी बनाने का लक्ष्य तय समय से करीब पांच महीने पहले पूरा कर लिया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार, 24 अक्टूबर 2026 को यह ऐलान किया। उन्होंने कहा कि 23 अक्टूबर की रात तक 11 करोड़ किसान आईडी बन चुकी थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लक्ष्य 31 मार्च 2027 तक पूरा करने का रखा था, और अब यह उससे काफी पहले हासिल हो गया है। इस डिजिटल पहचान को किसान पहचान पत्र भी कहा जाता है। यह 11 अंकों की एक विशिष्ट संख्या है, जो हर किसान की अलग पहचान बनेगी।

क्या है किसान आईडी और क्यों है यह अहम

किसान आईडी एक आधार जैसी विशिष्ट डिजिटल पहचान है, जो राज्य के भूमि अभिलेखों से गतिशील रूप से जुड़ी रहती है। इसमें किसान की जनसांख्यिकीय जानकारी, बोई गई फसल और भूमि के स्वामित्व से जुड़े विवरण शामिल होते हैं। इसका मकसद यह है कि सरकारी योजनाओं का लाभ सही किसान तक, सही समय पर और पारदर्शी तरीके से पहुंचे। अब तक किसानों को अलग-अलग योजनाओं के लिए बार-बार एक ही तरह के कागज जमा करने पड़ते थे और बार-बार सत्यापन कराना पड़ता था। किसान आईडी से यह दोहराव खत्म होने की उम्मीद है। कृषि मंत्री के अनुसार, अब किसानों को कागजों का ढेर बार-बार जमा नहीं करना पड़ेगा और न ही अंतहीन दस्तावेज देने पड़ेंगे।

डिजिटल कृषि मिशन और एग्रीस्टैक की भूमिका

किसान आईडी डिजिटल कृषि मिशन के तहत एग्रीस्टैक ढांचे का हिस्सा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2 सितंबर 2024 को डिजिटल कृषि मिशन को मंजूरी दी थी, जिसकी कुल लागत 2,817 करोड़ रुपये है, जिसमें केंद्र का हिस्सा 1,940 करोड़ रुपये है। एग्रीस्टैक के तहत तीन मुख्य रजिस्ट्रियां बनाई जा रही हैं। पहली है किसानों की रजिस्ट्री, जिसके जरिए किसान आईडी जारी होती है। दूसरी है भू-संदर्भित ग्राम मानचित्रों की रजिस्ट्री और तीसरी है बोई गई फसल की रजिस्ट्री। इन तीनों के मिलने से खेती से जुड़ा एक सत्यापित डिजिटल डेटाबेस तैयार होता है, जिसका इस्तेमाल योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान, फसल की जानकारी और सहायता के वितरण में किया जा सकेगा।

मंत्री ने क्या कहा: ऐतिहासिक दिन और सहकारी संघवाद की मिसाल

वीडियो संदेश में कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह भारतीय कृषि के लिए ऐतिहासिक दिन है। उन्होंने कहा कि 11 करोड़ किसान आईडी बनाने का काम समय से पहले पूरा हो गया है। उन्होंने इसे सहकारी संघवाद का उत्कृष्ट उदाहरण बताया और केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों तथा जिला स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों को धन्यवाद दिया। उन्होंने किसानों से सीधे संबोधित करते हुए कहा कि अब उनकी अपनी विशिष्ट पहचान है और वे सरकारी योजनाओं का समय पर लाभ उठाएं तथा खेती की पद्धतियों को बेहतर बनाने के लिए तकनीक अपनाएं। मंत्री ने इसे विकसित भारत के दृष्टिकोण से भी जोड़ा और कहा कि आधुनिक कृषि क्षेत्र के लिए तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है।

किसानों को क्या-क्या लाभ मिलेंगे

कृषि मंत्रालय के अनुसार, किसान आईडी ही वह एकमात्र दस्तावेज होगा, जिससे किसान बैंक ऋण, फसल बीमा, आपदा राहत और अपनी उपज की बिक्री से जुड़ी सेवाओं तक पहुंच सकेंगे। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के क्रियान्वयन को मजबूत करने में भी इस सत्यापित डेटाबेस की भूमिका होगी। प्राकृतिक आपदा से फसल को नुकसान होने पर नुकसान के आकलन में अधिक पारदर्शिता आएगी और पात्र मुआवजे का भुगतान जल्दी हो सकेगा। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल की खरीद के दौरान किसानों की पहचान के सत्यापन में भी यह प्रणाली मदद करेगी। किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं के तहत संस्थागत ऋण तक पहुंच भी सरल होने की उम्मीद है। मंत्रालय के अनुसार, 6 करोड़ से अधिक किसानों को पहले ही किसान आईडी आधारित सेवा वितरण के जरिए विभिन्न योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष लाभ मिल चुका है।

आंकड़ों में किसान आईडी की तस्वीर

मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, 11 करोड़ पंजीकृत किसानों में से लगभग 26 प्रतिशत महिलाएं हैं। लगभग 81 प्रतिशत किसान सीमांत और लघु जोत वाले वर्ग से आते हैं, यानी जिनके पास छोटी जोत है। आयु के हिसाब से देखें तो लगभग 15 प्रतिशत किसान 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं, जबकि 7.5 प्रतिशत किसान 30 वर्ष से कम आयु के हैं। अधिकांश किसान 30 से 70 वर्ष की आयु के बीच हैं। यह आंकड़ा बताता है कि डिजिटल पहचान का दायरा सिर्फ एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे किसानों और महिला किसानों तक भी पहुंचा है। विकास की गति भी उल्लेखनीय रही है। मार्च 2025 में किसान आईडी की संख्या लगभग 4.86 करोड़ थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर 10.31 करोड़ हो गई और 23 अक्टूबर 2026 की रात तक 11 करोड़ तक पहुंच गई।

पृष्ठभूमि: पायलट जिलों से राष्ट्रीय अभियान तक

किसान आईडी की शुरुआत पायलट परियोजनाओं से हुई थी। शुरुआती दौर में छह राज्यों के एक-एक जिले में पायलट चलाए गए थे, जिनमें उत्तर प्रदेश का फर्रुखाबाद, गुजरात का गांधीनगर, महाराष्ट्र का बीड़, हरियाणा का यमुनानगर, पंजाब का फतेहगढ़ साहिब और तमिलनाडु का विरुधुनगर शामिल थे। इसके बाद धीरे-धीरे राज्यों ने कृषि मंत्रालय के साथ समझौते किए और अभियान का विस्तार हुआ। रबी 2024-25 के दौरान डिजिटल फसल सर्वेक्षण में 492 जिलों और 23.5 करोड़ से अधिक भूखंडों को शामिल किया गया था, जो डिजिटल कृषि डेटाबेस की नींव का हिस्सा है। यह सफर बताता है कि किसान आईडी रातोंरात नहीं बनी, बल्कि भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण और राज्यों के सहयोग से चरण-दर-चरण आगे बढ़ी है।

मध्य प्रदेश के किसानों के लिए इसका क्या मतलब है

मध्य प्रदेश देश के प्रमुख कृषि राज्यों में से एक है, और रबी सीजन के दौरान किसान गेहूं, चना, सरसों जैसी फसलों की तैयारी में जुटे होते हैं। ऐसे समय में किसान आईडी का विस्तार इसलिए अहम है, क्योंकि योजनाओं, बीमा और ऋण से जुड़ी प्रक्रियाओं में सत्यापित पहचान से समय बचेगा। शिवराज सिंह चौहान खुद मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं और अब केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में इस अभियान की अगुवाई कर रहे हैं। हाल ही में शुरू हुआ रबी 2026 का खेत बचाओ अभियान भी किसानों तक संतुलित उर्वरक उपयोग, फसल विविधीकरण और जल संरक्षण जैसे संदेश पहुंचा रहा है। किसान आईडी और इस तरह के अभियानों का एक साथ आगे बढ़ना खेती को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में कदम है। हालांकि, किसी राज्य विशेष के किसान आईडी के आंकड़े इस ऐलान में अलग से नहीं दिए गए हैं, इसलिए इस खबर में मध्य प्रदेश का कोई अलग आंकड़ा दावा नहीं किया जा रहा है।

आगे क्या: असली खेती करने वालों तक पहुंच की चुनौती

मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, किसान आईडी पहल की अगली अहम प्राथमिकता उन असली खेती करने वालों को शामिल करना है, जो भूमि मालिक के रूप में दर्ज नहीं हो सकते हैं। इसमें काश्तकार और बटाईदार जैसे किसान शामिल हो सकते हैं, जो खेत जोतते तो हैं, लेकिन जमीन उनके नाम नहीं होती। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि योजनाओं का लाभ उसी तक पहुंचना चाहिए, जो वास्तव में खेती कर रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना होगा कि राज्यों के भूमि अभिलेखों और किसान रजिस्ट्री के बीच तालमेल से इस वर्ग तक पहुंच कैसे बनती है। साथ ही, यह भी देखा जाएगा कि किसान आईडी से जुड़ी सेवाओं का विस्तार गांव-गांव तक कितनी तेजी से होता है और किसान इसका इस्तेमाल योजनाओं, ऋण और बीमा के लिए कितनी आसानी से कर पाते हैं।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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