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आज हमारी चर्चा गुरु की महादशा मे चंद्र राहु और मंगल के अन्तर्दशा के परिणामों को लेकर होगी।
गुरु की महादशा मे चन्द्रमा की अन्तर्दशा एक वर्ष चार माह की होती है। कुंडली मे यदि गुरु और चन्द्रमा उच्च राशि मूल त्रिकोण राशि या स्व राशि के होकर केंद्र या त्रिकोण मे स्थित हो तो इस दशा मे जातक की प्रवृत्ति सात्विक होती है। धर्म के प्रति जातक की आस्था जागृत होती है। यदि गुरु अशुभ प्रभाव मे हो और चन्द्रमा नीच राशि के हो तो इस दशा मे जातक रोग ग्रस्त और पीड़ित भी हो सकता है। जातक को मानसिक परेशानी भी हो सकती है।
गुरु की महादशा मे महादशा मे मंगल की अन्तर्दशा 11 माह छह दिन की होती है। यदि शनि कुंडली मे उच्च राशि के हो या स्व राशि के होकर केंद्र या त्रिकोण मे हो तो इस दशा मे जातक को कार्य कुशलता प्राप्त होती है। जातक परिश्रमी होता है। जातक ज्ञानार्जन के लिये प्रयास शील होता है। यदि गुरु अशुभ प्रभाव मे हो और शनि भी पीड़ित हो तो इस अन्तर्दशा मे जातक को अपने सेवकों से ,अपने भूमि संबंधी कार्यों और शत्रु पक्ष से हानि प्राप्त होती है।
गुरु की महादशा मे राहु की अन्तर्दशा दो वर्ष चार माह 24 दिन की होती है। यदि राहु कुंडली मे अच्छी स्थिति मे हो तो इस अन्तर्दशा मे जातक को अचानक से बड़े लाभ प्राप्त होते है। अगर कुंडली मे राजनीति के योग हो तो इस दशा मे जातक राजनीति मे भी जा सकता है। यदि राहु अशुभ स्थिति मे हो तो इस अन्तर्दशा मे जातक धर्म कर्म के विपरीत आचरण करने लगता है। जातक को भ्रम की स्थिति बनी रहती है। यदि कुंडली मे चन्द्रमा पीड़ित हो तो जातक को कई प्रकार के phobia हो सकते है इस अन्तर्दशा मे।
आज हमारी गुरु की महादशा मे सारे ग्रहों की अन्तर्दशा के परिणामकारी की श्रंखला समाप्त होती है। अब शनि की महादशा मे सारे ग्रहों की अन्तर्दशा के परिणामों की चर्चा आगामी पोस्ट मे करेंगे।
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ज्योतिषाचार्य निर्विकार शर्मा
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