मात्र 23 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद-ए-आज़म भगत सिंह साहस और देशभक्ति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। उनकी कहानी हर पीढ़ी के युवाओं को प्रेरित करती है।
उन्होंने साबित किया कि देशभक्ति का मतलब सिर्फ भावना नहीं, बल्कि विचारों की स्पष्टता और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस है।
क्रांति का रास्ता
वर्ष 1907 में लायलपुर के बंगा गांव में जन्मे भगत सिंह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य थे। कम उम्र में ही उन्होंने देश की आज़ादी को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था।
असेंबली में बम — सांकेतिक विरोध
8 अप्रैल 1929 को उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका — यह किसी की हत्या का प्रयास नहीं, बल्कि बहरी ब्रिटिश सरकार तक आवाज़ पहुंचाने का सांकेतिक विरोध था।
“इंकलाब जिंदाबाद” का नारा
लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध और “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे को उन्होंने घर-घर पहुंचाया। जेल के दिनों में लिखे उनके लेख और विचार आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं।
उनके लेख बताते हैं कि वे सिर्फ क्रांतिकारी नहीं, गहरे विचारक भी थे — जो समाज में बराबरी और न्याय का सपना देखते थे।

23 मार्च 1931 को लाहौर में उन्हें फांसी दे दी गई। शहादत के इतने वर्षों बाद भी भगत सिंह साहस और देशभक्ति के सबसे बड़े प्रतीक बने हुए हैं।
