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भारत अक्षय ऊर्जा शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा संदेश: स्वच्छ ऊर्जा ही आर्थिक सुरक्षा की कुंजी, 500 गीगावाट का लक्ष्य

सांकेतिक चित्र: सूर्योदय के समय सौर ऊर्जा संयंत्र सांकेतिक चित्र: सूर्योदय के समय सौर ऊर्जा संयंत्र

नई दिल्ली ब्यूरो

सार: भारत मंडपम में भारत अक्षय ऊर्जा शिखर सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दुनिया के मौजूदा संकट ने साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा सीधे आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि भारत ने 2025 में ही अपनी स्थापित बिजली क्षमता का आधा हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य पूरा कर लिया, 44,000 से अधिक सरकारी भवनों पर सौर ऊर्जा लग चुकी है और देश 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता की ओर बढ़ रहा है।

सम्मेलन का उद्घाटन और वैश्विक मंच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन और एक्सपो 2026 का उद्घाटन किया और वहां जुटे प्रतिनिधियों को संबोधित किया। यह चार दिन का सम्मेलन 2 से 5 नवंबर तक चलेगा। इसका विषय है — निवेश करें, नवाचार करें, प्रेरित करें। इस मंच पर नीति निर्माता, निवेशक, वित्तीय संस्थाएं और उद्योग जगत के नेता एक साथ आए हैं, जिनका मकसद स्वच्छ ऊर्जा में निवेश, नवाचार और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को बढ़ावा देना है।

इस सम्मेलन के साथ ही अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की नौवीं सभा और हरित हाइड्रोजन पर चौथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी हो रहा है। इस तरह एक ही मंच पर दुनिया की तीन बड़ी स्वच्छ ऊर्जा पहलकदमियां एक साथ आ गई हैं। आयोजकों के अनुसार 130 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों के इस सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है, जिनमें 40 से अधिक मंत्री भी शामिल हैं। यह आंकड़ा बताता है कि भारत अब स्वच्छ ऊर्जा की वैश्विक चर्चा में केवल भागीदार नहीं, बल्कि मेजबान और दिशा तय करने वाले देश के रूप में देखा जा रहा है।

इससे पहले इस सम्मेलन के आयोजन की घोषणा के समय ही यह साफ हो गया था कि भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा यात्रा को दुनिया के सामने एक सफल मॉडल के रूप में रखना चाहता है। उद्घाटन भाषण में प्रधानमंत्री ने उसी यात्रा के आंकड़े, अनुभव और आगे की योजना को विस्तार से रखा। उन्होंने जोर दिया कि स्वच्छ ऊर्जा अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था, रोजगार और राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुका है।

ऊर्जा सुरक्षा ही आर्थिक सुरक्षा

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन का सबसे अहम संदेश एक ही वाक्य में रखा — ऊर्जा सुरक्षा सीधे आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि दुनिया में चल रहे संकट ने यह बात साफ कर दी है कि जिस देश की ऊर्जा व्यवस्था कमजोर होगी, उसकी अर्थव्यवस्था पर भी दबाव आएगा। जीवाश्म ईंधन के भंडार सीमित हैं, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा की संभावना असीमित है। हर क्षेत्र और हर देश को इसका लाभ मिल सकता है।

उन्होंने कहा कि अगर भारत ने पिछले एक दशक में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश नहीं किया होता और नई व्यवस्थाएं नहीं बनाई होतीं, तो मौजूदा संकट में देश की स्थिति बाकी दुनिया की तुलना में कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी। यह बात इसलिए अहम है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने ऊर्जा की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट और भू-राजनीतिक तनाव के असर को करीब से देखा है। ऐसे में घरेलू स्तर पर पैदा होने वाली स्वच्छ ऊर्जा किसी भी देश के लिए एक तरह की सुरक्षा कवच बन जाती है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा का भविष्य केवल बिजली पैदा करने तक सीमित नहीं है। इससे खेती, उद्योग, परिवहन और घरेलू जीवन — हर क्षेत्र में बदलाव आ रहा है। जब किसान अपने खेत में सौर पंप से सिंचाई करता है, जब घर की छत पर लगा पैनल बिजली का बिल घटाता है और जब सरकारी भवन अपनी बिजली खुद पैदा करते हैं, तब ऊर्जा का मतलब केवल आपूर्ति नहीं रह जाता, बल्कि आत्मनिर्भरता बन जाता है।

सांकेतिक चित्र: घर की छत पर सौर पैनल
सांकेतिक चित्र: घर की छत पर सौर पैनल

50 प्रतिशत का लक्ष्य पांच साल पहले हासिल

भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा का सबसे बड़ा दावा पेरिस समझौते से जुड़ा है। भारत ने यह वादा किया था कि अपनी स्थापित बिजली क्षमता का आधा हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करेगा। प्रधानमंत्री ने बताया कि यह लक्ष्य 2025 में ही पूरा कर लिया गया, यानी तय समय से पांच साल पहले। आज देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता का आधा से अधिक हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से आता है।

गैर-जीवाश्म क्षमता का आंकड़ा अब लगभग 300 गीगावाट के करीब पहुंच गया है। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री ने इस मौके पर बताया कि यह क्षमता 310 गीगावाट को पार कर चुकी है और पिछले दो वर्षों में इसमें 110 गीगावाट से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। दोनों आंकड़ों में थोड़ा अंतर गणना के आधार और समय का हो सकता है, लेकिन दिशा एक ही है — भारत तेजी से 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत अब दुनिया के शीर्ष तीन सौर और नवीकरणीय ऊर्जा देशों में शामिल है। देश का अगला लक्ष्य 100 गीगावाट नई गैर-जीवाश्म क्षमता और जोड़ना है। उन्होंने भरोसा जताया कि भारत यह लक्ष्य भी हासिल करेगा, क्योंकि पिछले दशक में देश ने स्वच्छ ऊर्जा के बुनियादी ढांचे, नीतियों और निवेश के मोर्चे पर लगातार काम किया है।

घरों तक पहुंची सौर ऊर्जा: सूर्य घर योजना

स्वच्छ ऊर्जा की कहानी केवल बड़े बिजली संयंत्रों तक सीमित नहीं है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में घरों तक पहुंची सौर ऊर्जा का भी विस्तार से जिक्र किया। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना फरवरी 2024 में शुरू हुई थी, जिसका लक्ष्य एक करोड़ घरों की छतों पर सौर पैनल लगाना है। पिछले करीब दो वर्षों में 65 लाख से अधिक घर इस योजना से जुड़ चुके हैं।

इन घरों के बिजली बिलों में भारी कमी आई है। सरकारी अनुमानों के अनुसार लाभार्थी परिवारों के बिजली बिल 76 प्रतिशत तक घटे हैं, और कई उपभोक्ताओं के बिल लगभग शून्य तक पहुंच गए हैं। इसका मतलब है कि छत पर लगा सौर पैनल अब केवल पर्यावरण के लिए अच्छा विकल्प नहीं है, बल्कि परिवार के मासिक बजट के लिए भी राहत बन गया है।

इस योजना का एक और पहलू यह है कि इससे घरेलू स्तर पर बिजली उत्पादन की संस्कृति बढ़ी है। पहले बिजली केवल ग्रिड से आने वाली चीज मानी जाती थी। अब लाखों परिवार खुद बिजली पैदा करने वाले बन गए हैं। इससे ग्रिड पर दबाव घटता है, बिजली की बर्बादी कम होती है और लोगों में ऊर्जा के प्रति जागरूकता बढ़ती है। आने वाले वर्षों में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और स्ट्रीट लाइटिंग तक को सौर ऊर्जा से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

किसानों के लिए कुसुम योजना

खेती में सौर ऊर्जा का असर सबसे सीधे तौर पर किसानों की जेब पर दिखता है। प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान, जिसे कुसुम योजना के नाम से जाना जाता है, के तहत 30 लाख से अधिक किसानों को सौर ऊर्जा से चलने वाली सिंचाई सुविधाएं मिली हैं। अनुमान है कि सौर पंप अपनाने वाले हर किसान को सालाना करीब एक लाख रुपये की बचत होती है।

डीजल पंप की तुलना में सौर पंप का खर्च लंबे समय में कहीं कम पड़ता है। किसान को न तो डीजल की बढ़ती कीमत का डर रहता है और न ही बिजली कटौती के कारण सिंचाई रुकने की चिंता। दिन में धूप के समय पंप चलता है, जब खेत को पानी की सबसे अधिक जरूरत होती है। इससे फसल की पैदावार पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।

कुसुम योजना का एक और लाभ यह है कि किसान अतिरिक्त बिजली बेचकर भी कमाई कर सकते हैं। इससे खेती केवल खर्च का काम नहीं रह जाती, बल्कि आय का एक नया स्रोत भी बनती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में उद्योगों, खेतों और घरों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का काम लगातार हुआ है, और यही इस यात्रा की असली ताकत है।

सरकारी भवनों पर सौर ऊर्जा से 700 करोड़ की बचत

सम्मेलन में सामने आया एक अहम आंकड़ा सरकारी भवनों से जुड़ा है। देशभर में 44,000 से अधिक सरकारी भवनों को सौर ऊर्जा से जोड़ा जा चुका है। इन भवनों पर लगे सौर सिस्टम से सालाना करीब 700 करोड़ रुपये की बचत हो रही है। यह रकम सीधे सरकारी खजाने की बचत है, जो पहले बिजली के बिलों में खर्च होती थी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार का लक्ष्य हर सरकारी भवन, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और स्ट्रीट लाइटिंग सिस्टम को सौर ऊर्जा से जोड़ना है। जब हर सरकारी भवन अपनी बिजली खुद पैदा करेगा, तो सरकारी खर्च घटेगा और बिजली की मांग का एक बड़ा हिस्सा स्वच्छ स्रोतों से पूरा होगा। इससे शहरों और गांवों, दोनों जगह बिजली व्यवस्था पर दबाव कम होगा।

यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है, क्योंकि सरकारी भवन दिन के समय सबसे अधिक बिजली इस्तेमाल करते हैं — ठीक उसी समय जब धूप सबसे तेज होती है। यानी सौर ऊर्जा का उत्पादन और खपत का समय एक-दूसरे से मेल खाता है। इससे ग्रिड पर निर्भरता घटती है और बिजली की आपूर्ति अधिक स्थिर होती है।

मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता की छलांग

भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा केवल बिजली पैदा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके उपकरण बनाने में भी देश ने बड़ी छलांग लगाई है। प्रधानमंत्री ने बताया कि एक दशक पहले देश की सौर मॉड्यूल उत्पादन क्षमता केवल 2 गीगावाट थी, जो अब 200 गीगावाट से अधिक हो चुकी है। सौर सेल बनाने की क्षमता भी 40 गीगावाट तक पहुंच गई है।

इसका सीधा असर सौर बिजली की कीमत पर पड़ा है। एक समय सौर बिजली की दर 10 से 11 रुपये प्रति यूनिट के आसपास थी, जो अब घटकर करीब 2.15 रुपये प्रति यूनिट तक आ गई है। जब बिजली सस्ती होती है, तो उद्योगों की लागत घटती है, किसानों को राहत मिलती है और आम उपभोक्ताओं के बिल कम होते हैं।

इस बदलाव के पीछे घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियां, निवेश और तकनीक का विस्तार है। देश अब सौर उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता घटा रहा है। इससे रोजगार भी बढ़ रहे हैं, क्योंकि कारखानों, स्थापना और रखरखाव के काम में बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत पड़ती है।

ग्रीन हाइड्रोजन और आने वाले दशक का निवेश

स्वच्छ ऊर्जा का अगला बड़ा पड़ाव ग्रीन हाइड्रोजन है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत इस दशक के अंत तक सालाना 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहा है। सरकार हरित हाइड्रोजन को परिवहन क्षेत्र से भी जोड़ रही है, ताकि भारी वाहनों और उद्योगों में भी स्वच्छ ईंधन का इस्तेमाल बढ़ सके।

निवेश के मोर्चे पर भी आंकड़े बड़े हैं। पिछले एक दशक में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आया है, जिसमें से करीब 6 लाख करोड़ रुपये का निवेश 2024 के री-इन्वेस्ट सम्मेलन के बाद से आया है। सरकार का अनुमान है कि इस दशक के अंत तक इस क्षेत्र में 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश अवसर पैदा होंगे। इसमें बिजली उत्पादन, भंडारण, ग्रीन हाइड्रोजन, विनिर्माण और ट्रांसमिशन का बुनियादी ढांचा शामिल है।

ट्रांसमिशन के लिए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और एकल आवृत्ति वाली राष्ट्रीय ग्रिड को मजबूत किया जा रहा है। हाल में सरकार ने इस बुनियादी ढांचे के लिए 2 लाख करोड़ रुपये के निवेश का फैसला भी लिया है। इसका मकसद यह है कि जहां सौर और पवन ऊर्जा पैदा हो, वहां से उसे देश के हर कोने तक पहुंचाया जा सके।

आगे क्या: 2030 का रोडमैप और आम लोगों के लिए अवसर

सम्मेलन से यह संदेश साफ है कि भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा अब अगले चरण में प्रवेश कर चुकी है। पहला चरण क्षमता बढ़ाने का था, दूसरा चरण घरों, खेतों और सरकारी भवनों तक सौर ऊर्जा पहुंचाने का था, और तीसरा चरण भंडारण, ग्रीन हाइड्रोजन और घरेलू विनिर्माण का है। बैटरी भंडारण की स्वदेशी व्यवस्था विकसित करना अब प्राथमिकता है, ताकि रात में भी सौर ऊर्जा का इस्तेमाल हो सके।

भारत ने विकासशील देशों के लिए 200 मिलियन डॉलर की अफ्रीका सौर सुविधा का प्रस्ताव भी दोहराया है। इसका मकसद विकासशील अर्थव्यवस्थाओं तक स्वच्छ ऊर्जा की तकनीक और वित्त पहुंचाना है। इससे भारत की भूमिका केवल अपने देश तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए भी एक साझेदार के रूप में उभरती है।

आम लोगों के लिए इस यात्रा का मतलब सीधा है — सस्ती बिजली, कम बिल, किसानों की कम लागत और युवाओं के लिए हरित क्षेत्र में नए रोजगार। जो परिवार छत पर सौर पैनल लगाना चाहता है, जो किसान सौर पंप अपनाना चाहता है और जो युवा स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में काम करना चाहता है, उनके लिए आने वाले वर्ष अवसरों के वर्ष होंगे। सम्मेलन के अगले दिनों में निवेश, तकनीक और साझेदारी से जुड़ी और घोषणाएं सामने आ सकती हैं, जिन पर नजर रहेगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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