देवास ब्यूरो। देवास शहर के मध्य करीब 300 फीट ऊंची टेकरी (पहाड़ी) पर दो देवियों — बड़ी मां तुलजा भवानी और छोटी मां चामुंडा देवी के प्राचीन मंदिर स्थित हैं। मान्यता है कि यहां माता सती का रक्त गिरा था, इसलिए इस स्थान को रक्तपीठ कहा जाता है और यह सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है। देवास शहर का नाम भी दो देवियों के वास के कारण पड़ा माना जाता है।
मान्यता है कि दोनों देवियों की मूर्तियां स्वयंभू और जागृत स्वरूप में हैं। लोकमान्यता के अनुसार दोनों देवियां बहनें हैं — एक विवाद के बाद बड़ी मां पाताल में समाने लगीं और छोटी मां टेकरी से उतरने लगीं; हनुमान और भैरव बाबा के आग्रह पर दोनों वहीं रुक गईं। इसलिए बड़ी मां (तुलजा भवानी) का स्वरूप आधा धड़ पाताल में समाया हुआ माना जाता है और वे दक्षिणमुखी हैं, जबकि छोटी मां (चामुंडा) उत्तरमुखी हैं। परंपरा के अनुसार दर्शन की परिक्रमा बड़ी मां से शुरू होकर छोटी मां के दर्शन पर पूर्ण होती है।

फोटो: सौजन्य dewas.nic.in
यह स्थान नाथ संप्रदाय का प्रमुख सिद्ध स्थल माना जाता है; मान्यता है कि गुरु गोरखनाथ परंपरा के साधक यहां तपस्या करते रहे हैं। बड़ी मां तुलजा भवानी होलकर राजवंश की और छोटी मां चामुंडा पंवार राजवंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। देवास के संबंध में यह भी लोकमान्यता है कि यह पहला ऐसा शहर था, जहां दो वंशों ने एक साथ शासन किया था।
मान्यता है कि देवास टेकरी से उज्जैन की भर्तृहरि गुफा तक लगभग 45 किलोमीटर लंबी सुरंग है, जिससे राजा भर्तृहरि मां के दर्शन के लिए आते-जाते थे। टेकरी परिसर में कई अन्य मंदिर भी स्थित हैं, जिनका दर्शन पैदल परिक्रमा में किया जा सकता है।
नवरात्रि में विशेष: चैत्र और शारदीय — दोनों नवरात्रियों में टेकरी पर लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मनोकामना पूर्ति पर भक्त घुटनों के बल या दंडवत प्रणाम करते हुए टेकरी चढ़ते हैं, और प्रशासन विशेष व्यवस्था करता है।
कैसे पहुंचें: मंदिर देवास शहर की पहाड़ी पर स्थित है, जहां सीढ़ियों से दर्शनार्थी ऊपर पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय तक रेल और सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
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