2 अक्टूबर राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी की जयंती है। सत्य, स्वावलंबन, स्वदेशी, सामाजिक समरसता और सादगी जैसे जीवन-मूल्यों को गांधीजी ने केवल अपने विचारों में ही नहीं, बल्कि अपने आचरण में भी स्थान दिया। राष्ट्रजीवन में इन्हीं मूल्यों की खोज उन्हें एक बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर तक भी ले गई।
ऐतिहासिक प्रसंगों के अनुसार गांधीजी एक बार संघ के शिविर में स्वयंसेवकों के बीच पहुंचे थे। वहां उन्होंने अनुशासन, सादगी, स्वावलंबन और जातिगत भेदभाव से परे आत्मीयता को निकट से देखा। यह अनुभव उनके लिए उल्लेखनीय था।
बताया जाता है कि शिविर में सभी स्वयंसेवक एक साथ रहते-खाते थे और उनमें छुआछूत या जातिगत भेद का कोई भाव नहीं दिखा। गांधीजी ने स्वयंसेवकों के इस अनुशासन और समरसता की सराहना की थी। बाद के वर्षों में भी संघ के स्वयंसेवकों के अनुशासन और अस्पृश्यता के अभाव का उल्लेख उनसे जोड़ा जाता रहा।
गांधी जयंती पर यह प्रसंग याद दिलाता है कि राष्ट्रजीवन के मूल्य — सत्य, अनुशासन और समरसता — किसी एक संगठन या विचारधारा की बपौती नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी धरोहर हैं।
साभार: पांचजन्य
