इंदौर ब्यूरो
सार: इंदौर में संघ सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को राजनीतिक मुद्दा बनाने से इनकार करते हुए कहा कि इसका मकसद सूची को त्रुटिहीन बनाना है, मृतकों और दोहरी प्रविष्टियों को हटाना एक नियमित प्रक्रिया है, और सत्ता परिवर्तन का रास्ता केवल चुनाव है।
इंदौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय वार्षिक बैठक के समापन के बाद सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने बुधवार को पत्रकारों से चर्चा की। इस बैठक में देशभर से करीब चार सौ प्रतिनिधि शामिल हुए थे और संघ के शीर्ष नेतृत्व ने संगठनात्मक विषयों पर मंथन किया था। पत्रकार वार्ता में होसबाले जी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, युवाओं के आंदोलनों, काशी-मथुरा से जुड़े सवालों और आरक्षण जैसे मुद्दों पर संघ का दृष्टिकोण रखा। उनकी टिप्पणियों का सबसे ज्यादा चर्चा वाला हिस्सा मतदाता सूची से जुड़ा रहा, क्योंकि इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दलों के बीच पहले से तीखा टकराव चल रहा है।
इंदौर में पत्रकार वार्ता: किस मौके पर क्या कहा गया
इंदौर के डेली कॉलेज में दो से चार नवंबर तक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक चली। इसमें सरसंघचालक मोहन भागवत जी, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी, छह सह सरकार्यवाह और अखिल भारतीय पदाधिकारी शामिल हुए। बैठक के समापन के बाद होसबाले जी ने पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए। इस दौरान उन्होंने एक के बाद एक कई संवेदनशील मुद्दों पर अपनी बात रखी, लेकिन हर मुद्दे पर उनका जोर एक ही बात पर रहा — लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान और समाज में संवाद।
मतदाता सूची के मुद्दे पर उन्होंने साफ कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया समय-समय पर होनी चाहिए और इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपने एजेंडा के अनुसार काम करने का अधिकार है, लेकिन किसी मुद्दे पर केवल विरोध के लिए विरोध करना उचित नहीं है। पहले यह देखना चाहिए कि उस मुद्दे में सच्चाई है भी या नहीं।
एसआईआर का मकसद: सूची को त्रुटिहीन बनाना
होसबाले जी ने कहा कि निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण का मकसद सूचियों को त्रुटिहीन बनाना है। उनके शब्दों में, इस प्रक्रिया का उद्देश्य सूची का परिष्कार करना होता है, यानी उसमें मौजूद खामियों को दूर करना। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि इस प्रक्रिया का सियासी विरोध क्यों हो रहा है। उनका कहना था कि मतदाता सूची की गड़बड़ियों को दूर करने की प्रक्रिया देश में नियमित तौर पर होती आई है, इसलिए इस पर राजनीति होने की बात उनकी समझ से परे है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया किसी एक चुनाव या किसी एक राज्य तक सीमित सोच से नहीं देखी जानी चाहिए। सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ी है, क्योंकि मतदान के अधिकार का इस्तेमाल सही व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए और गलत प्रविष्टियों का बने रहना पूरी व्यवस्था को कमजोर करता है। इसी तर्क के साथ उन्होंने पुनरीक्षण को आवश्यक बताया और कहा कि समय-समय पर सूची का पुनरीक्षण होना ही चाहिए।

तीन खामियाँ जिनका हवाला दिया गया
अपनी बात को समझाने के लिए होसबाले जी ने मतदाता सूची में पाई जाने वाली तीन तरह की खामियों का जिक्र किया। पहली खामी मृत व्यक्तियों के नामों का सूची में बने रहना है। उन्होंने कहा कि देश में जिन लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं, उनमें से कई लोगों की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। दूसरी खामी एक ही व्यक्ति का दो स्थानों पर पंजीकरण होना है। एक ही मतदाता का नाम दो जगह दर्ज होना सूची को अनावश्यक रूप से बड़ा बनाता है और व्यवस्था में भ्रम पैदा करता है।
तीसरी और सबसे गंभीर खामी के रूप में उन्होंने गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज होने का मुद्दा उठाया। होसबाले जी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है और उसका नाम मतदाता सूची में दर्ज है, तो यह गंभीर विषय है। इसका संबंध केवल चुनावी व्यवस्था से नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से भी है। उनके अनुसार, नागरिकता से जुड़ी शुद्धता को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इसका असर व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
शेषन का उदाहरण और बेंगलुरु वाला अपना उदाहरण
अपने तर्क को ऐतिहासिक संदर्भ देने के लिए होसबाले जी ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का उदाहरण दिया। उन्होंने याद दिलाया कि जब शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब उन्होंने बिहार की मतदाता सूची का परिष्कार किया था। इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि इसमें क्या गलत था और उस समय देश में किसकी सरकार थी। इस उदाहरण के जरिए उनका इशारा यह था कि सूची की सफाई की प्रक्रिया किसी दल विशेष की पहल नहीं है, बल्कि यह पहले भी हो चुकी है और तब भी इसे व्यवस्था के सुधार के रूप में देखा गया था।
उन्होंने अपना निजी उदाहरण भी दिया। होसबाले जी ने कहा कि अगर इन दिनों वह बेंगलुरु में रहते हैं, तो उनका नाम उनके पैतृक गांव की मतदाता सूची से काट दिया जाना चाहिए। इस उदाहरण से उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि निवास स्थान बदलने पर पुराने स्थान की प्रविष्टि का बने रहना ही वह खामी है, जिसे पुनरीक्षण के जरिए दूर किया जाता है। उनके अनुसार, यह सामान्य प्रशासनिक शुद्धता है, न कि किसी मतदाता को निशाना बनाने की कार्रवाई।
दूसरा पक्ष: विपक्ष की आपत्ति क्या है
इस मुद्दे पर दूसरा पक्ष विपक्षी दलों का है, जिनकी आपत्ति को समझे बिना पूरी तस्वीर अधूरी रहेगी। विपक्षी गठबंधन ने एक नवंबर को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली आयोजित की थी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग उठी थी और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे जा रहे हैं और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
होसबाले जी की ताजा टिप्पणियों पर विपक्ष की ओर से कोई नई प्रतिक्रिया अभी सामने आने की जानकारी उन स्रोतों में नहीं मिली है, जिनके आधार पर यह खबर तैयार की गई है। इसलिए इस खबर में विपक्ष की प्रतिक्रिया के रूप में केवल उसका पहले से दर्ज रुख रखा गया है, कोई नई प्रतिक्रिया गढ़ी नहीं गई है। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की ओर से फॉर्म-6 से जुड़ा स्पष्टीकरण भी पहले आ चुका है, जिसके तहत नए मतदाताओं के लिए ऑनलाइन फॉर्म और पुनरीक्षण से जुड़ी घोषणा को अलग-अलग किया गया था।
जेन-जी आंदोलन पर चेतावनी और संवाद की अपील
पत्रकार वार्ता में होसबाले जी से युवाओं के आंदोलनों के बारे में भी सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि देश के अंदर और बाहर की कुछ अराजक शक्तियां युवाओं को साजिश के तहत भड़काने की कोशिश कर रही हैं। उनके अनुसार, युवाओं को भड़काने के पीछे कुछ आंतरिक और बाहरी शक्तियों का षड्यंत्र हो सकता है। समाज में अशांति फैलाकर और हिंसा के माध्यम से बदलाव लाने का प्रयास राष्ट्र और समाज के हित में नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता परिवर्तन चुनावों के जरिए होता है। सत्ता परिवर्तन के मकसद की आड़ में अशांति और हिंसा फैलाना या भेदभाव पैदा करना समाज के हित में नहीं है। साथ ही उन्होंने यह संतुलन भी रखा कि युवाओं के मन में जो आकांक्षाएं और बातें हैं, उनके बारे में समाज और शासन को ध्यान देना चाहिए। संघ युवाओं के साथ संवाद किए जाने का आग्रह करता है और युवाओं की वास्तविक समस्याओं तथा मांगों का प्रशासनिक स्तर पर समाधान होना चाहिए। उन्होंने जेपी आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय वह खुद भी युवाओं की पीढ़ी का हिस्सा थे, इसलिए हर दौर में युवाओं के मन में व्यवस्था के खिलाफ विचार आना स्वाभाविक है, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के चलते उनके दुरुपयोग का विरोध किया जाना चाहिए।
काशी-मथुरा और आरक्षण पर रुख
काशी-मथुरा से जुड़े सवालों पर होसबाले जी ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर बनाकर दिखाने का संकल्प पूरा हो चुका है। अब काशी, मथुरा और भोजशाला जैसे विषयों के लिए समाज को आगे आना चाहिए। अदालतों में चल रहे मामलों के बारे में उन्होंने कहा कि जो काम अदालत से हो रहे हैं, उन्हें अदालत से होने देना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए। हर चीज के लिए एक ही प्रकार से काम किया जाना जरूरी नहीं है और हर चीज पर आंदोलन करने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वाराणसी और मथुरा से जुड़े विवादों को लेकर विशाल हिंदू समुदाय के मन की भावनाओं के आधार पर कई लोग पहले से मुद्दा उठाते हुए प्रयत्न कर रहे हैं और इस बारे में संघ कोई नया आंदोलन शुरू करने पर विचार नहीं कर रहा है। आरक्षण के मुद्दे पर होसबाले जी ने कहा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को जब तक समान अवसर नहीं मिलते, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। जातिगत आरक्षण की व्यवस्था को उन्होंने ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से आवश्यक बताया और कहा कि भेदभाव, पिछड़ापन, असमानताएं और विषमताएं दूर होने तक यह व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। आरक्षण पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और इसका उपयोग समाज के हित में किया जाना चाहिए, ताकि जिन लोगों को इसकी आवश्यकता है, उन्हें इसका लाभ मिल सके।
आगे क्या होगा
इस पत्रकार वार्ता के बाद मतदाता सूची के मुद्दे पर बहस और तेज होने की संभावना है, क्योंकि एक ओर संघ ने पुनरीक्षण को नियमित प्रक्रिया बताया है और दूसरी ओर विपक्ष ने इसमें अनियमितताओं का आरोप लगाया है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया, फॉर्म-6 से जुड़े नियम और राज्यों में चल रहे पुनरीक्षण के अगले चरणों पर सबकी नजर रहेगी। इंदौर की बैठक के समापन के बाद संगठनात्मक ढांचे में बदलाव और अन्य प्रस्तावों पर भी चर्चा जारी है, लेकिन मतदाता सूची वाला बयान राजनीतिक बहस के केंद्र में बना हुआ है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल होसबाले जी की टिप्पणियों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और चुनाव आयोग की ओर से सूची की शुद्धता को लेकर और क्या कदम उठाए जाते हैं। तब तक इस मुद्दे को किसी एक पक्ष के बयान के रूप में नहीं, बल्कि दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के टकराव के रूप में समझना ही सही होगा। एक पक्ष इसे सूची की सफाई की नियमित प्रक्रिया मानता है, दूसरा पक्ष इसे मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा मानता है।
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