नई दिल्ली ब्यूरो
सार: चार राज्यों में बैलेट पेपर से हुए विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी नतीजे को लेकर कांग्रेस पर तंज कसा, तो कांग्रेस ने पलटवार करते हुए सभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव बैलेट पेपर से कराने की चुनौती दे दी। बैलेट पेपर एमएलसी चुनाव को लेकर अब देश में ईवीएम बनाम बैलेट पेपर की बहस फिर तेज हो गई है।
बैलेट पेपर एमएलसी चुनाव: चार राज्यों में कांग्रेस शून्य पर
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। इन सीटों पर स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाताओं ने वोट डाले। मतगणना 27 अक्टूबर से शुरू हुई और 28 अक्टूबर को घोषित हुए नतीजों में कांग्रेस को चारों राज्यों में एक भी सीट नहीं मिली।
कांग्रेस ने इस बैलेट पेपर एमएलसी चुनाव में 28 सीटों में से 12 पर चुनाव लड़ा था — बिहार में पांच, महाराष्ट्र में तीन, कर्नाटक में चार और उत्तर प्रदेश में एक भी नहीं। इसके बावजूद पार्टी का खाता नहीं खुला। भाजपा ने 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और कई सीटों पर जीत दर्ज की।
कर्नाटक में कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लगा, जहां पार्टी की सरकार है। वहां की चारों सीटें भाजपा-जद(एस) गठबंधन के खाते में गईं। भाजपा ने तीन सीटें जीतीं, जबकि जद(एस) ने बेंगलुरु शिक्षक सीट कांग्रेस से छीन ली। उत्तर प्रदेश में बुधवार दोपहर तक घोषित नतीजों में भाजपा को पांच और समाजवादी पार्टी को तीन सीटें मिली थीं। बिहार में भाजपा, जद(यू), राजद और एक निर्दलीय के साथ जन सुराज पार्टी ने भी एक सीट जीतकर विधान परिषद में अपना खाता खोला। महाराष्ट्र में भाजपा नीत महायुति तीन सीटों पर आगे थी, जबकि विपक्षी राकांपा (शरद पवार गुट) दो सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी। कुछ सीटों पर मतगणना जारी थी, इसलिए अंतिम आंकड़ा अभी बाकी है।
मोदी का पोस्ट: ‘अंदाजा लगाइए, कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?’

विधान परिषद चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने लिखा, “MLC elections in 28 seats across 4 big states – Uttar Pradesh, Maharashtra, Bihar and Karnataka. Elections held using ballot papers. Guess how many seats Congress won?” यानी, चार बड़े राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर चुनाव हुए, मतदान बैलेट पेपर से हुआ, अंदाजा लगाइए कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?
प्रधानमंत्री का यह तंज कांग्रेस की उस मांग की ओर इशारा था, जिसमें पार्टी लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करती रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” का आरोप लगाते रहे हैं और उनका कहना रहा है कि चुनाव प्रक्रिया में धांधली से भाजपा को फायदा पहुंचता है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी पेपर बैलेट पर लौटने की वकालत कर चुके हैं। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री ने बैलेट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस के शून्य प्रदर्शन को निशाना बनाया।
कांग्रेस का पलटवार: ‘सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराओ’
प्रधानमंत्री के तंज पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पार्टी के मीडिया और प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री को इतना ही भरोसा है कि ईवीएम का चुनाव नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ता, तो वे इसे काम करके दिखाएं, सिर्फ बयानबाजी से नहीं।
पवन खेड़ा ने चार मांगें रखीं। पहली, आगे से सभी लोकसभा और आगामी विधानसभा चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएं। दूसरी, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रोका जाए। तीसरी, मतदाता सूची से कथित रूप से अवैध तरीके से हटाए गए 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम बहाल किए जाएं। चौथी, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया जाए और उन्हें आजीवन संरक्षण देने वाला कानून रद्द किया जाए। खेड़ा ने कहा कि जब तक इन मांगों पर अमल नहीं होता, प्रधानमंत्री के दावे खोखले शब्दों से ज्यादा कुछ नहीं हैं।
कर्नाटक में हार पर राज्य के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि पार्टी चारों सीटों पर हार की समीक्षा करेगी और गलतियों को सुधारा जाएगा। कांग्रेस के अन्य नेताओं ने उम्मीदवारों के चयन पर सवाल उठाए और गलतियां स्वीकार कीं, हालांकि उन्होंने हार के लिए बैलेट पेपर व्यवस्था को जिम्मेदार नहीं ठहराया।
भाजपा की प्रतिक्रिया: ‘रियलिटी चेक लें’
भाजपा ने भी कांग्रेस पर हमला बोला। पार्टी की महासचिव स्मृति ईरानी ने कहा कि जो लोग ईवीएम को कटघरे में खड़ा करते हैं और वोट चोरी का रोना रोते हैं, उन्हें जनता ने बैलेट पेपर पर भी जवाब दे दिया है। उन्होंने कहा कि हर हार के बाद जनमत का अपमान करने वालों को बहानेबाजी छोड़कर जमीन पर उतरकर वास्तविकता का सामना करना चाहिए।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि गलती न ईवीएम की है, न बैलेट पेपर की, बल्कि कांग्रेस की सोच की है। भाजपा का कहना है कि बैलेट पेपर से हुए चुनाव में भी कांग्रेस का खाता न खुलना यह बताता है कि पार्टी की हार का कारण मतदान का तरीका नहीं, बल्कि जनता का भरोसा खोना है।
बैलेट पेपर एमएलसी चुनाव बैलेट से ही क्यों होते हैं?
विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव हमेशा बैलेट पेपर से होते हैं। इसकी वजह मतदान की पद्धति है। इन चुनावों में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में रैंक करते हैं, यानी वरीयता के आधार पर वोट देते हैं। ईवीएम में वरीयता आधारित मतदान दर्ज नहीं किया जा सकता, इसलिए इन सीटों पर कागजी मतपत्र का इस्तेमाल होता है।
इन निर्वाचन क्षेत्रों में सिर्फ पंजीकृत स्नातक और शिक्षक ही वोट डाल सकते हैं। आम विधानसभा या लोकसभा चुनाव की तरह यहां सभी मतदाता वोट नहीं डालते। यही कारण है कि इन चुनावों को लेकर ईवीएम और बैलेट पेपर की बहस में अक्सर इनका उदाहरण दिया जाता है, जबकि दोनों चुनावों की मतदान प्रणाली ही अलग-अलग है।
राज्यवार नतीजों का ब्योरा
उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर चुनाव हुआ — छह शिक्षक और पांच स्नातक निर्वाचन क्षेत्र। बुधवार दोपहर तक घोषित नतीजों में भाजपा ने पांच सीटें जीतीं, जिनमें मेरठ शिक्षक और स्नातक सीटें शामिल हैं, जबकि समाजवादी पार्टी को तीन सीटें मिलीं, जिनमें वाराणसी शिक्षक सीट शामिल है।
कर्नाटक में चारों सीटों पर भाजपा-जद(एस) गठबंधन ने जीत दर्ज की। भाजपा ने उत्तर-पूर्व शिक्षक, दक्षिण-पूर्व स्नातक और पश्चिम स्नातक सीटें जीतीं, जबकि जद(एस) ने बेंगलुरु शिक्षक सीट पर जीत हासिल की।
बिहार में अब तक घोषित सीटों पर भाजपा, जद(यू), राजद और एक निर्दलीय के साथ जन सुराज पार्टी ने एक-एक सीट जीती है। जन सुराज के लिए यह विधान परिषद में पहली जीत है। महाराष्ट्र में तीन स्नातक और दो शिक्षक सीटों पर महायुति तीन सीटों पर आगे चल रही थी, जबकि राकांपा (शरद पवार गुट) दो सीटों पर बढ़त बनाए हुए थी।
आगे क्या: ईवीएम बनाम बैलेट की बहस और तेज होगी
कुछ सीटों पर मतगणना अभी जारी है, इसलिए चारों राज्यों का अंतिम आंकड़ा आना बाकी है। लेकिन इतना साफ है कि इस नतीजे ने ईवीएम बनाम बैलेट पेपर की बहस को नई धार दे दी है। कांग्रेस अब इस बहस को सभी चुनावों में बैलेट पेपर की मांग से जोड़ रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि बैलेट पेपर से हुए चुनाव में भी कांग्रेस की हार यह साबित करती है कि मुद्दा मतदान का तरीका नहीं है।
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले यह बहस और तेज होने की उम्मीद है। विपक्षी दल मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर पहले से ही सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में बैलेट पेपर एमएलसी चुनाव के नतीजे आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का एक बड़ा मुद्दा बने रहेंगे।
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