नई दिल्ली ब्यूरो
सार: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना को मंजूरी दे दी है। इस केंद्र प्रायोजित योजना के तहत 2026-27 से 2030-31 के बीच कुल 7,395.55 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, ताकि देश की 2.55 लाख से अधिक पंचायतें अपनी विकास योजनाएँ खुद बेहतर ढंग से बना सकें, पैसों का हिसाब पारदर्शी रख सकें और गाँवों की जरूरतों के हिसाब से फैसले ले सकें।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में लिया गया। बैठक के बाद केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने योजना की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह योजना गाँवों के शासन में एक बड़े बदलाव की ओर कदम है, क्योंकि अब तक कई योजनाएँ ऊपर से तय निर्देशों पर चलती थीं, जबकि नई योजना में पंचायतों को अपनी जरूरतों के अनुसार योजना बनाने की क्षमता दी जाएगी। इस फैसले का सीधा असर देश के हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की पंचायतों पर पड़ेगा, क्योंकि योजना पूरे देश में लागू होगी।
क्या है प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना
प्रधानमंत्री विकसित ग्राम स्वराज योजना एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसका मकसद ग्राम पंचायतों को स्थानीय शासन और विकास का मजबूत केंद्र बनाना है। विकसित भारत के बड़े लक्ष्य के साथ जोड़कर तैयार की गई यह योजना पंचायतों की योजना बनाने की क्षमता, विभागों के बीच तालमेल, जनप्रतिनिधियों के प्रशिक्षण और संसाधनों के पारदर्शी इस्तेमाल पर जोर देती है।
योजना का मूल विचार यह है कि गाँव के विकास का फैसला गाँव की जरूरतों से शुरू हो। पंचायत अपने गाँव की प्राथमिकताएँ पहचाने, उपलब्ध संसाधनों का आकलन करे और फिर केंद्र तथा राज्य सरकार की योजनाओं को उन प्राथमिकताओं से जोड़े। इस तरह विकास की योजना कागज पर नहीं, बल्कि जमीन की हकीकत पर बनेगी। सरकार का कहना है कि इससे पंचायतें मजबूत और आत्मनिर्भर बनेंगी।
कितना पैसा, किसका कितना हिस्सा
योजना का कुल परिव्यय 7,395.55 करोड़ रुपये तय किया गया है। इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 4,869.48 करोड़ रुपये होगा और राज्य सरकारों का हिस्सा 2,526.07 करोड़ रुपये होगा। योजना की अवधि 2026-27 से 2030-31 तक रहेगी, जो सोलहवें वित्त आयोग की अवधि के साथ मेल खाती है।
रकम का यह बँटवारा बताता है कि योजना में केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी होगी। केंद्र की ओर से दिशा, मानक और वित्तीय सहयोग मिलेगा, जबकि राज्यों के जरिए योजना जमीन पर उतरेगी। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी वार्षिक कार्ययोजनाएँ तैयार करनी होंगी, जिनमें गतिविधियाँ, प्राथमिकताएँ और जरूरतें दर्ज होंगी। इन कार्ययोजनाओं की जाँच और मंजूरी के लिए एक केंद्रीय सशक्त समिति तय की गई है।

2.55 लाख पंचायतों को सीधा लाभ
सरकार के अनुसार इस योजना का सीधा लाभ देश की 2.55 लाख से अधिक पंचायतों और पारंपरिक स्थानीय निकायों से जुड़े लगभग 32 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों, पंचायत कर्मियों और अन्य हितधारकों को मिलेगा। यानी सरपंचों से लेकर पंचायत समितियों के सदस्यों तक, लाखों जनप्रतिनिधियों की काम करने की क्षमता बढ़ाने पर योजना का जोर है।
इसके अलावा जागरूकता से जुड़े हर समन्वित अभियान के जरिए कम से कम एक करोड़ नागरिकों तक पहुँच बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसका मतलब यह है कि योजना सिर्फ प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आम ग्रामीणों तक सरकारी योजनाओं और राष्ट्रीय पहलों की जानकारी भी पहुँचाई जाएगी। ग्राम सभाओं और पंचायतों के अन्य मंचों के जरिए लोग अपने गाँव के विकास पर चर्चा कर सकेंगे और अपनी राय रख सकेंगे।
हर साल 2.55 लाख विकास योजनाएँ
योजना के तहत हर साल ईग्रामस्वराज पोर्टल पर कम से कम 2.55 लाख समग्र ग्राम पंचायत विकास योजनाएँ तैयार की जाएँगी। इन योजनाओं में गाँव की जरूरतों, केंद्र और राज्य सरकार के विभागों की योजनाओं और उपलब्ध संसाधनों को एक साथ जोड़ा जाएगा। योजना बनाने की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी और उपलब्ध आँकड़ों पर आधारित फैसलों को महत्व दिया जाएगा।
यह बिंदु योजना का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है। अब तक कई पंचायतों में विकास योजनाएँ औपचारिकता बनकर रह जाती थीं। नई व्यवस्था में हर पंचायत की योजना ऑनलाइन दर्ज होगी, जिससे उसकी निगरानी भी आसान होगी और गाँव के लोग भी जान सकेंगे कि उनके गाँव के लिए क्या तय हुआ है। योजना बनाने की इस प्रक्रिया से पंचायतों को अपने संसाधनों और सीमाओं की साफ समझ भी मिलेगी।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
योजना में वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता को खास जगह दी गई है। इसके तहत हर साल कम से कम 2.55 लाख ऑनलाइन ऑडिट योजनाएँ तैयार की जाएँगी और संबंधित ऑडिट समय पर पूरे किए जाएँगे। यह काम ऑडिटऑनलाइन व्यवस्था के जरिए होगा। बेहतर लेखांकन, सार्वजनिक जानकारी और पंचायतों की अपनी आय बढ़ाने के प्रयासों से पंचायतों की वित्तीय आत्मनिर्भरता बढ़ने की उम्मीद जताई गई है।
अपनी आय का सवाल पंचायतों के लिए लंबे समय से चुनौती रहा है। कई पंचायतें अनुदान पर निर्भर रहती हैं और अपनी आय के स्रोत सीमित होते हैं। नई योजना में वित्त आयोग के अनुदानों के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ अपनी आय के स्रोत जुटाने की क्षमता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया है। इससे पंचायतें सिर्फ अनुदान का इंतजार करने वाली संस्थाएँ नहीं रहेंगी, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगी।
प्रशिक्षण से बढ़ेगी जनप्रतिनिधियों की क्षमता
योजना का एक बड़ा हिस्सा क्षमता निर्माण यानी प्रशिक्षण पर खर्च होगा। निर्वाचित प्रतिनिधियों को सामान्य और विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे विकास योजनाएँ बनाना, नागरिकों से संवाद करना, संसाधनों का प्रबंधन करना और स्थानीय स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में काम करना सीख सकें। डिजिटल माध्यमों से भी मदद दी जाएगी, ताकि पंचायतों के कामकाज में तकनीक का इस्तेमाल बढ़े।
ग्रामीण शासन में यह पहलू इसलिए अहम है, क्योंकि पंचायतों के पास जिम्मेदारियाँ तो बहुत होती हैं, लेकिन कई बार प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी की कमी से फैसले कमजोर रह जाते हैं। प्रशिक्षित प्रतिनिधि न सिर्फ योजनाएँ बेहतर बना सकेंगे, बल्कि सरकारी योजनाओं की जानकारी गाँव के लोगों तक सही ढंग से पहुँचा भी सकेंगे। इससे योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुँचने की संभावना बढ़ेगी।
17 भाषाओं में जानकारी देगा पैनचैम
सरकारी योजनाओं और राष्ट्रीय पहलों की जानकारी आम लोगों तक आसान भाषा में पहुँचाने के लिए पैनचैम नामक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित बहुभाषी संचार मंच का इस्तेमाल किया जाएगा। यह मंच 17 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होगा। इसके जरिए योजनाओं की जानकारी सरल भाषा में समझाई जाएगी, ताकि भाषा किसी ग्रामीण के लिए बाधा न बने।
इसके साथ ही मौजूदा डिजिटल और प्रचार माध्यमों, ग्राम सभाओं और पंचायत मंचों के जरिए भी जागरूकता बढ़ाई जाएगी। मकसद यह है कि गाँव का हर नागरिक यह जान सके कि उसके लिए कौन सी योजना है, उसका लाभ कैसे मिलेगा और उस पर गाँव में चर्चा कैसे हो सकती है। जानकारी की यह पारदर्शिता पंचायतों की जवाबदेही भी बढ़ाएगी।
मध्य प्रदेश के लिए क्या मायने
यह योजना पूरे देश में लागू होगी, इसलिए मध्य प्रदेश की पंचायतें भी इसके दायरे में आएँगी। प्रदेश के गाँवों में भी पंचायतों को विकास योजनाएँ बनाने, प्रशिक्षण पाने, ऑडिट पूरा करने और अपनी आय बढ़ाने में इस योजना से सहयोग मिलेगा। प्रदेश में पंचायतों के जरिए ग्रामीण विकास की कई योजनाएँ पहले से चल रही हैं, और नई योजना उन प्रयासों को एक व्यवस्थित ढाँचे से जोड़ने का काम करेगी।
मध्य प्रदेश के लिए यह भी अहम है कि योजना में ग्राम सभाओं की भूमिका को मजबूत किया गया है। गाँव की जरूरतों पर चर्चा ग्राम सभा में होगी, तो फैसलों में लोगों की भागीदारी बढ़ेगी। इससे विकास योजनाएँ गाँव की असली जरूरतों से जुड़ेंगी, चाहे वह पेयजल हो, सड़क हो, शिक्षा हो या रोजगार से जुड़ी सुविधा हो।
कैसे लागू होगी योजना
योजना राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के जरिए लागू की जाएगी। राज्य अपनी वार्षिक कार्ययोजनाएँ तैयार करेंगे, जिनकी जाँच के बाद केंद्रीय सशक्त समिति उन्हें मंजूरी देगी। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है, ताकि हर राज्य की अलग जरूरतों के हिसाब से योजना ढल सके, लेकिन राष्ट्रीय मानक और पारदर्शिता बनी रहे।
योजना के तहत कोई स्थायी पद नहीं बनाए जाएँगे। हालांकि जरूरत के अनुसार राज्य, जिला और विकासखंड स्तर पर संविदा पर तकनीकी सहयोग के लिए लोग रखे जा सकेंगे, ताकि योजना के क्रियान्वयन में मदद मिल सके। पारंपरिक ग्रामीण स्थानीय निकायों वाले क्षेत्रों में भी, जहाँ संविधान के भाग नौ के तहत पंचायतें नहीं हैं, योजना लागू होगी।
आगे क्या देखना होगा
योजना की असली परीक्षा 2026-27 से शुरू होने वाले क्रियान्वयन में होगी। यह देखना होगा कि राज्यों की वार्षिक कार्ययोजनाएँ कितनी जल्दी मंजूर होती हैं, प्रशिक्षण का काम कितनी तेजी से शुरू होता है और ईग्रामस्वराज पोर्टल पर विकास योजनाएँ कितनी गुणवत्ता के साथ बनती हैं। ऑडिट के समय पर पूरे होने और पंचायतों की अपनी आय में बढ़ोतरी भी योजना की सफलता के अहम पैमाने होंगे।
पंचायतों के लिए यह योजना एक अवसर भी है और जिम्मेदारी भी। अवसर इसलिए कि अब उनके पास योजना बनाने, प्रशिक्षण पाने और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का एक व्यवस्थित ढाँचा होगा। जिम्मेदारी इसलिए कि इस ढाँचे का लाभ तभी मिलेगा, जब पंचायतें पारदर्शी तरीके से काम करेंगी और ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी बढ़ाएँगी। आने वाले वर्षों में गाँवों के विकास की दिशा इस बात से तय होगी कि पंचायतें इस अवसर का कितना अच्छा इस्तेमाल करती हैं।
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