भोपाल ब्यूरो
सार: मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थलों पर डिजिटल सहायक अब पर्यटकों की अपनी भाषा में बात करेगा। पर्यटन स्थलों पर डिजिटल सहायक के रूप में लगाए जा रहे क्यूआर कोड वाले बोर्ड और कियोस्क को स्कैन करते ही 130 से अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में उस जगह का इतिहास, संस्कृति और धार्मिक महत्त्व, आसपास के आकर्षण, परिवहन और ठहरने की जानकारी मिल जाएगी। इसके लिए न कोई ऐप डाउनलोड करना होगा, न खाता बनाना होगा और न कोई भुगतान करना होगा। पहले साल 30 प्रमुख गंतव्यों से शुरू होकर तीन साल में यह सुविधा राज्य के 100 पर्यटन स्थलों तक पहुँचाने की योजना है।
क्या है यह AI गाइड
इस डिजिटल यात्रा साथी का नाम NiVU AI है। यह बातचीत पर आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली प्रणाली है, जो पर्यटक के सवालों का जवाब आवाज़ और लिखित दोनों रूपों में दे सकती है। पर्यटक को बस अपने मोबाइल या लैपटॉप के ब्राउज़र से पर्यटन स्थल पर लगे क्यूआर कोड को स्कैन करना होगा। इसके बाद वह सीधे उस जगह से जुड़ी जानकारी तक पहुँच जाएगा।
पारंपरिक सूचना पट्टों पर सीमित जानकारी लिखी होती है, जिसे पढ़कर आगे बढ़ जाना पड़ता है। यह नई व्यवस्था उससे अलग है। यहाँ पर्यटक सवाल पूछ सकता है, कहानी जान सकता है और अपनी रुचि के हिसाब से आसपास घूमने की योजना बना सकता है। किसी जगह के बारे में जानने के लिए अब गाइड का इंतज़ार करने या भाषा की दिक्कत से जूझने की ज़रूरत नहीं रहेगी।
यह सुविधा खास तौर पर उन पर्यटकों के लिए उपयोगी मानी जा रही है, जो मध्य प्रदेश पहली बार आ रहे हैं या जिनकी भाषा स्थानीय भाषा से अलग है। विदेशी पर्यटकों के लिए भी यह एक बड़ी सहूलियत होगी, क्योंकि वे अपनी भाषा में ही उस स्थल की कहानी और महत्त्व समझ सकेंगे।
समझौता कहाँ और कैसे हुआ

यह पहल मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड और Explurger नाम की कंपनी के बीच हुए तीन साल के समझौते के तहत आगे बढ़ रही है। समझौते की घोषणा भोपाल में आयोजित मध्य प्रदेश ट्रैवल मार्ट 2026 के दौरान हुई थी। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, मुख्य सचिव अशोक बरनवाल, पर्यटन बोर्ड के प्रबंध निदेशक इलैयाराजा टी. और अपर प्रबंध निदेशक अभय अरविंद बेडेकर मौजूद थे। समझौते पर Explurger के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी जितिन भाटिया ने हस्ताक्षर किए।
इसी समझौते के तहत Explurger को मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड का आधिकारिक AI और सोशल मीडिया साझेदार बनाया गया है। इसका अर्थ है कि इस कार्यक्रम के तहत डिजिटल अनुभव की ज़िम्मेदारी कंपनी संभालेगी, जबकि गंतव्यों का चयन और पर्यटन से जुड़ी दिशा पर्यटन बोर्ड के साथ मिलकर तय होगी।
समझौते के अनुसार पहले साल 30 प्रमुख गंतव्यों का चयन किया जाएगा। इन गंतव्यों को समझौते के 90 दिन के भीतर दोनों पक्ष मिलकर अंतिम रूप देंगे। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से तीन साल में यह सुविधा 100 गंतव्यों तक विस्तारित की जाएगी। इनमें मंदिर, किले, धरोहर स्थल, वन्यजीव गंतव्य और सांस्कृतिक आकर्षण शामिल होंगे।
पर्यटक को क्या-क्या मिलेगा
पर्यटक इस डिजिटल साथी से किसी जगह का इतिहास पूछ सकेगा, उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि जान सकेगा और आसपास के दर्शनीय स्थलों की जानकारी ले सकेगा। परिवहन और होटल से जुड़ी बुनियादी जानकारी भी इसी माध्यम से मिलेगी। इसके अलावा यह प्रणाली पर्यटक की रुचि के अनुसार यात्रा की सिफारिशें भी देगी और व्यक्तिगत यात्रा कार्यक्रम भी तैयार कर सकेगी।
किसी प्रसिद्ध जगह के अलावा छिपे हुए आकर्षणों की जानकारी भी इस व्यवस्था से मिलने की बात कही गई है। अक्सर पर्यटक किसी बड़े स्थल तक तो पहुँच जाते हैं, लेकिन उसके आसपास की छोटी, रोचक जगहों से अनजान रह जाते हैं। बातचीत वाली यह प्रणाली ऐसे छिपे हुए स्थलों की ओर भी ध्यान दिला सकेगी, जिससे पर्यटक का अनुभव सिर्फ एक जगह देखने तक सीमित नहीं रहेगा।
इंटरैक्टिव कहानी कहने की शैली भी इस पहल का एक अहम हिस्सा है। किसी किले की दीवार, किसी मंदिर की बनावट या किसी वन क्षेत्र की विशेषता के पीछे की कहानी पर्यटक सवाल-जवाब के रूप में जान सकेगा। इससे यात्रा सिर्फ देखने की गतिविधि नहीं रहेगी, बल्कि समझने और जुड़ने का अनुभव भी बनेगी।
पर्यटन बोर्ड को क्या फायदा होगा
इस व्यवस्था से पर्यटन बोर्ड को एक विशेष विश्लेषण डैशबोर्ड भी मिलेगा। इसके ज़रिए यह समझा जा सकेगा कि पर्यटक किन जगहों में सबसे अधिक रुचि ले रहे हैं, वे सबसे अधिक कौन से सवाल पूछ रहे हैं, किन भाषाओं का सबसे अधिक इस्तेमाल हो रहा है और किस गंतव्य पर कितनी भागीदारी हो रही है।
पर्यटन बोर्ड के प्रबंध निदेशक के अनुसार इस तरह की जानकारी से गंतव्यों की योजना बेहतर बनाने, पर्यटन प्रचार की रणनीति तय करने, बुनियादी ढाँचे के विकास और नीतियाँ बनाने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि यह मंच पर्यटकों को राज्य के ऐतिहासिक स्मारकों, सांस्कृतिक धरोहर, धार्मिक स्थलों, वन्यजीव आकर्षणों और प्राकृतिक पर्यटन स्थलों को जानने में मदद करेगा।
तकनीक लगाने, स्थापित करने, होस्टिंग, रखरखाव और उन्नयन से जुड़ा पूरा खर्च विकसित करने वाली कंपनी उठाएगी। पर्यटक के लिए यह सेवा निःशुल्क रहेगी। यह बात इस पहल को आम पर्यटक के लिए और अधिक सुलभ बनाती है, क्योंकि उसे इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा।
मध्य प्रदेश के पर्यटन के लिए क्यों अहम है यह पहल
मध्य प्रदेश को देश के हृदय प्रदेश के रूप में जाना जाता है। यहाँ खजुराहो के मंदिर, साँची के स्तूप, भीमबेटका के शैलाश्रय जैसे विश्व धरोहर स्थल हैं। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, ओंकारेश्वर और चित्रकूट जैसे धार्मिक केंद्र हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच जैसे वन क्षेत्र वन्यजीव प्रेमियों के बीच प्रसिद्ध हैं।
इतनी विविधता के बावजूद भाषा अक्सर पर्यटकों के सामने एक दीवार बन जाती है। किसी विदेशी पर्यटक के लिए किसी मंदिर की कथा या किसी किले का इतिहास समझना तब मुश्किल हो जाता है, जब जानकारी सिर्फ एक-दो भाषाओं में उपलब्ध हो। 130 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध यह डिजिटल साथी उसी दीवार को गिराने का प्रयास है।
इसके अलावा यह पहल राज्य के पर्यटन को आधुनिक पहचान भी देती है। आज का पर्यटक यात्रा से पहले मोबाइल पर जानकारी खोजता है और यात्रा के दौरान भी डिजिटल माध्यम से जुड़ा रहना चाहता है। क्यूआर कोड से मिलने वाली तत्काल जानकारी उसी आदत से मेल खाती है। इससे मध्य प्रदेश उन राज्यों की पंक्ति में खड़ा होता है, जो पर्यटन में तकनीक का सक्रिय इस्तेमाल कर रहे हैं।
दूसरे राज्यों में भी यही मॉडल
मध्य प्रदेश से पहले यही कंपनी आंध्र प्रदेश, गोवा और दिल्ली में भी इसी तरह की सुविधा शुरू कर चुकी है। आंध्र प्रदेश में जुलाई 2026 में तीन साल की रणनीतिक साझेदारी के तहत 100 से अधिक प्रमुख पर्यटन, धरोहर और तीर्थ स्थलों पर यह सुविधा शुरू हुई थी। वहाँ भी क्यूआर कोड वाले “ASK AI” बोर्डों के ज़रिए पर्यटक बिना अलग ऐप के अपने ब्राउज़र से जानकारी ले सकते हैं।
गोवा में कैंडोलिम सहित कई पर्यटन स्थलों पर लगभग 150 क्यूआर बोर्ड लगाने की योजना है, जिनमें अगुआड़ा किला, सिनक्वेरिम और मैंग्रोव बोर्डवॉक जैसे स्थल शामिल हैं। दिल्ली में दिल्ली हाट, आईएनए में इस सुविधा की पहली स्थापना हुई है, जहाँ पर्यटक स्थानीय शिल्प, खानपान परंपरा, सांस्कृतिक अनुभव और आसपास के आकर्षणों के बारे में जान सकते हैं।
कंपनी के अनुसार उसके मंच से 75 से अधिक देशों के ढाई करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता जुड़े हुए हैं। मध्य प्रदेश की साझेदारी को कंपनी अब तक की सबसे बड़ी तैनातियों में से एक मान रही है, क्योंकि यहाँ व्यक्तिगत स्थलों से आगे बढ़कर पूरे राज्य के स्तर पर एक पर्यटन तंत्र बनाने की कोशिश हो रही है।
आगे क्या होगा
आने वाले महीनों में सबसे पहले पहले साल के 30 प्रमुख गंतव्यों का चयन अंतिम होगा। इसके बाद उन स्थानों पर क्यूआर कोड वाले बोर्ड और कियोस्क लगाए जाएँगे। फिर धीरे-धीरे तीन साल की अवधि में यह संख्या 100 तक पहुँचेगी। पूरी तैनाती में लगभग तीन साल का समय लगने का अनुमान है।
पर्यटकों के लिए एक सावधानी भी ज़रूरी है। आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार इस डिजिटल साथी के लिए न कोई ऐप डाउनलोड करना है, न खाता बनाना है और न कोई भुगतान करना है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति इस सुविधा के नाम पर ऐप डाउनलोड करने या भुगतान करने के लिए कहे, तो वह आधिकारिक प्रक्रिया नहीं होगी। पर्यटकों को सिर्फ पर्यटन स्थलों पर लगे आधिकारिक बोर्ड और कियोस्क से ही क्यूआर कोड स्कैन करना चाहिए।
कुल मिलाकर यह पहल मध्य प्रदेश के पर्यटन को एक नई दिशा दे सकती है। भाषा की बाधा दूर होगी, तो पर्यटक राज्य की धरोहर, आस्था, वन्यजीव और संस्कृति को अधिक गहराई से समझ सकेंगे। और जब पर्यटक किसी जगह को समझकर लौटता है, तो वह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि एक याद लेकर जाता है। यही याद आगे चलकर नए पर्यटकों को भी मध्य प्रदेश की ओर खींचती है।
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