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उज्जैन में महाकाल परिसर के 13 प्राचीन मंदिरों का होगा कायाकल्प: 10.27 करोड़ की लागत से जीर्णोद्धार, रखरखाव की जिम्मेदारी यूडीए की — महाकाल लोक के बाद सबसे बड़ा बदलाव

Symbolic image: ancient temple spires and a river ghat in Ujjain

उज्जैन ब्यूरो

उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के भक्तों के लिए एक बड़ी और अच्छी खबर सामने आई है। महाकाल मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन और धार्मिक महत्व के 13 अन्य मंदिरों को एक बार फिर से संवारने यानी जीर्णोद्धार की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए करीब सवा 10 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है। परिसर में स्थित विभिन्न प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार और संरचनाओं के रखरखाव की जिम्मेदारी उज्जैन विकास प्राधिकरण द्वारा उठाई जा रही है। महाकाल लोक बनने के बाद परिसर में यह सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन ही नहीं, पूरे देश के शिव भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और पर्व-त्योहारों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में परिसर के प्राचीन मंदिरों की देखरेख और उनका संरक्षण लंबे समय से एक अहम जरूरत के रूप में देखा जा रहा था। अब 10.27 करोड़ रुपये की इस योजना के साथ इन मंदिरों के कायाकल्प का रास्ता साफ हो गया है।

क्या है योजना: 10.27 करोड़ की लागत, दो एजेंसियों को जिम्मेदारी

परियोजना के तहत पीएमसी एजेंसी के रूप में सीबीआरआइ और निर्माण एजेंसी के रूप में एएआइसी को नियुक्त किया गया है। इनकी देखरेख में कुल 10.27 करोड़ रुपये की लागत से मंदिरों के जीर्णोद्धार और मरम्मत संबंधी कार्य किए जा रहे हैं। पीएमसी एजेंसी का काम परियोजना के प्रबंधन और गुणवत्ता की निगरानी से जुड़ा होता है, जबकि निर्माण एजेंसी मैदान पर वास्तविक निर्माण और मरम्मत का काम करती है। दोनों एजेंसियों के बीच समन्वय से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि प्राचीन संरचनाओं की मूल पहचान और धार्मिक स्वरूप से कोई छेड़छाड़ न हो और मरम्मत का काम परंपरागत स्वरूप के अनुरूप ही हो।

रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना में मंदिरों की संरचनाओं के रखरखाव पर विशेष जोर दिया गया है। प्राचीन मंदिरों में समय के साथ आई टूट-फूट, शिखरों और दीवारों की मरम्मत, परिसर की व्यवस्थाओं का सुदृढ़ीकरण और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़े काम शामिल किए गए हैं। राशि स्वीकृत हो जाने के बाद अब काम को आगे बढ़ाने की तैयारी चल रही है।

किन मंदिरों का होगा कायाकल्प

जिन मंदिरों का कायाकल्प होना है, उनमें वृद्धकालेश्वर मंदिर यानी जूना महाकाल, अनादि कल्पेश्वर मंदिर, ओंकारेश्वर मंदिर, कालेश्वर मंदिर, चिंतामणि गणेश मंदिर, मनकामनेश्वर मंदिर, सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, गोवर्धन मंदिर, केदारेश्वर मंदिर, भीमाशंकर मंदिर, पाताल महादेव मंदिर, त्र्यंबकेश्वर मंदिर और कोटि सरोवर मंदिर इत्यादि सम्मिलित हैं। ये सभी मंदिर महाकाल मंदिर परिसर से जुड़े प्राचीन धार्मिक स्थल हैं और इनका अपना अलग-अलग धार्मिक महत्व है।

इन मंदिरों में से कई का इतिहास महाकाल मंदिर के इतिहास से जुड़ा हुआ है। श्रद्धालु महाकाल के दर्शन के साथ-साथ इन मंदिरों में भी दर्शन करते हैं। यही वजह है कि इनके जीर्णोद्धार को केवल निर्माण कार्य के रूप में नहीं, बल्कि उज्जैन की धार्मिक विरासत के संरक्षण के रूप में देखा जा रहा है। परिसर के मंदिरों का एक साथ संवरना दर्शन व्यवस्था को भी और सुगम बनाएगा।

महाकाल मंदिर का लंबा इतिहास: 1731 से 1968 तक जीर्णोद्धार की परंपरा

महाकाल मंदिर का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है। 18वीं शताब्दी में मराठा काल के दौरान इसका सबसे बड़ा और आधुनिक पुनर्निर्माण हुआ। सन् 1234-35 में दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश द्वारा प्राचीन मंदिर को ध्वस्त किए जाने के लगभग 500 वर्षों बाद, मराठा शासनकाल में मंदिर को नया स्वरूप मिला। महाराजा राणोजी शिंदे के दीवान रामचंद्र बाबा शेणवी ने सन् 1731-1734 ई. के आसपास मंदिर का वर्तमान स्वरूप निर्मित करवाया और ज्योतिर्लिंग की दोबारा प्रतिष्ठा कराई।

इसके बाद 1968 में सिंहस्थ महापर्व से पहले महाकाल मंदिर के मुख्य द्वार का विस्तार, सुसज्जीकरण और श्रद्धालुओं की निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण व जीर्णोद्धार कार्य किया गया। समय-समय पर शिखर व आंशिक जीर्णोद्धार के काम भी होते रहे हैं। मंदिर परिसर के शिखरों, कोटि तीर्थ कुंड, प्रांगण के विभिन्न हिस्सों और शिखर पर स्वर्ण कलश व स्वर्ण परत चढ़ाने जैसे सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार के कार्य लगातार होते रहे हैं। अब 13 मंदिरों की यह योजना इसी लंबी परंपरा की अगली कड़ी है।

महाकाल लोक के बाद सबसे बड़ा बदलाव

हालिया समय का सबसे बड़ा विस्तार महाकाल लोक बनने के बाद हुआ। अक्टूबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘श्री महाकाल लोक’ कॉरिडोर के पहले चरण का लोकार्पण किया गया था। इस योजना के तहत मंदिर परिसर का दायरा कई गुना बढ़ गया, जिसमें रुद्रसागर का पुनरुद्धार, मुरल वॉल, शिव स्तंभ और आधुनिक सुविधाओं का निर्माण हुआ।

महाकाल लोक के बनने के बाद से महाकाल मंदिर में हर दिन डेढ़ से दो लाख श्रद्धालुओं के आने का क्रम बन गया है। पर्व-त्योहारों पर यह भीड़ और अधिक बढ़ जाती है। श्रद्धालुओं की इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए परिसर की व्यवस्थाओं, प्राचीन मंदिरों के रखरखाव और दर्शन की सुविधाओं को लगातार मजबूत करने की जरूरत महसूस की जा रही थी। 13 मंदिरों के जीर्णोद्धार की योजना इसी जरूरत का जवाब मानी जा रही है।

सिंहस्थ-2028 की तैयारियों से भी जुड़ा है यह काम

उज्जैन में सिंहस्थ-2028 की तैयारियां भी चल रही हैं और शहर में बुनियादी ढांचे व व्यवस्थाओं से जुड़े कामों पर प्रशासन की नजर है। हाल ही में सिंहस्थ की तैयारियों में लापरवाही पर ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी सामने आई थी, जिसमें घटिया निर्माण और देरी पर जुर्माना लगाया गया था। ऐसे में महाकाल परिसर के मंदिरों का जीर्णोद्धार सिंहस्थ से पहले धार्मिक व्यवस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। हालांकि रिपोर्ट में इस योजना की समय-सीमा को लेकर कोई तारीख नहीं बताई गई है, इसलिए काम के पूरा होने की तारीख को लेकर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

श्रद्धालुओं के लिए क्या बदलेगा

जीर्णोद्धार पूरा होने के बाद श्रद्धालुओं को परिसर के प्राचीन मंदिरों में बेहतर दर्शन व्यवस्था, सुरक्षित संरचनाएं और सुव्यवस्थित परिसर मिलने की उम्मीद है। प्राचीन मंदिरों की मरम्मत से उनकी आयु बढ़ेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह धार्मिक विरासत सुरक्षित रह सकेगी। साथ ही, मंदिरों के आसपास की व्यवस्थाओं के सुदृढ़ होने से भीड़ के दिनों में भी दर्शन का अनुभव बेहतर होगा।

उज्जैन की पहचान महाकाल की नगरी के रूप में है और यहां की अर्थव्यवस्था में धार्मिक पर्यटन की बड़ी भूमिका है। मंदिरों के संरक्षण और परिसर के विकास से श्रद्धालुओं की संख्या और ठहराव दोनों पर सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद की जा रही है। स्थानीय व्यापार, होटल, परिवहन और पूजा-सामग्री से जुड़े कामों पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।

आगे क्या होगा

अब सबकी नजर इस बात पर है कि जीर्णोद्धार का काम किस क्रम में और किस गति से आगे बढ़ता है। क्या सभी 13 मंदिरों का काम एक साथ शुरू होगा या चरणबद्ध तरीके से होगा, काम के दौरान दर्शन व्यवस्था कैसे बनी रहेगी और गुणवत्ता की निगरानी कैसे होगी — इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएंगे। फिलहाल इतना तय है कि महाकाल लोक के बाद परिसर में यह सबसे बड़ा बदलाव होने जा रहा है और उज्जैन की धार्मिक विरासत के संरक्षण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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