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आज हमारी चर्चा शनि की महादशा मे विभिन्न ग्रहों की अन्तर्दशा को लेकर होगी।
शनि की महादशा मे पहली अन्तर्दशा शनि की ही होती है जो तीन वर्ष तीन दिन की होती है।
यदि शनि कुंडली मे उच्च राशि स्व राशि या मूल त्रिकोण राशि के होकर शुभ प्रभाव मे हो तो इस दशा मे अपने सेवकों से लाभ प्राप्त होता है। जातक के व्यापार मे शनैः शनैः वृद्धि होती है जो चिर स्थायी होती है। इस अन्तर्दशा मे जातक परिश्रमी होता है।
यदि शनि नीच राशि या शत्रु राशि के होकर त्रिक स्थानों मे हो तो इस दशा मे जातक को अपने व्यवसाय मे असफलता हो सकती है। जातक को अपने नौकरों से हानि भी हो सकती है। यदि six lord कुंडली मे पीड़ित हो तो इस दशा मे जातक को दीर्घ कालिक रोग भी हो सकते है।
शनि की महादशा मे दूसरी अन्तर्दशा बुध की आती है। जो दो वर्ष आठ माह नौ दिन की होती है। यदि बुध उच्च राशि स्व राशि या मित्र राशि के स्थित हो तो इस दशा मे जातक अपने व्यापार मे सफलता प्राप्त करता है। जातक को ननिहाल पक्ष से भी लाभ प्राप्त होता है। जातक को नये विषय मे सीखने की इच्छा जागृत होती है। यदि बुध अशुभ प्रभाव मे हो अथवा नीच राशि के होकर त्रिक स्थानों मे हो अर्थात 6,8,12 भावों मे हो तो इस दशा मे जातक के व्यापार मे हानि भी हो सकती है। यदि six भाव का स्वामी कुंडली मे पीड़ित हो तो जातक को त्वचा जन्य रोग भी हो सकते है।
शनि की महादशा मे तीसरी अन्तर्दशा केतु की होती है जो एक वर्ष एक माह नौ दिन की होती है।
यदि केतु कुंडली मे शुभ प्रभाव मे हो तो इस अन्तर्दशा मे जातक धार्मिक अध्ययन करता है इसके लिये नवम भाव नवमेश और देव गुरु की भी स्थिति strong होनी चाहिये। यदि केतु अशुभ प्रभाव मे हो इस दशा मे जातक के कार्यों मे विघ्न आते है। जातक को कई बार ऐसे भी रोग हो जाते है जिनको doctor भी diagnose नहीं कर पाता।
शनि की महादशा मे शुक्र सूर्य और चन्द्रमा की अन्तर्दशा परिणामों की चर्चा आगामी पोस्ट मे करेंगे।
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ज्योतिषाचार्य निर्विकार शर्मा
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