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भोपाल में कल मत्स्यपालन निवेशक और निर्यातक सम्मेलन-2026: 1000 से ज्यादा किसान, निवेशक और निर्यातक होंगे शामिल; CM मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री रहेंगे मौजूद

Symbolic image — fishermen casting nets on a reservoir at sunrise

भोपाल ब्यूरो

अंतर्देशीय मत्स्यपालन उत्पादन को निवेश, प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन अवसंरचना, मूल्य संवर्धन और निर्यात बाजारों से जोड़ने के उद्देश्य से केंद्र सरकार शुक्रवार को भोपाल में ‘फिशरीज इन्वेस्टर्स एंड एक्सपोर्टर्स कॉन्क्लेव 2026’ का आयोजन कर रही है। इस सम्मेलन में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल और मध्यप्रदेश के मत्स्यपालन मंत्री नारायण सिंह पवार शामिल होंगे।

सरकारी बयान के अनुसार, सम्मेलन में मध्यप्रदेश के विभिन्न हिस्सों से 1000 से अधिक मत्स्यपालक, निवेशक, निर्यातक, मत्स्य सहकारी समितियां, मत्स्य किसान उत्पादक संगठन (FFPO), उद्यमी, स्टार्टअप, प्रोसेसर, वित्तीय संस्थान, अनुसंधान संगठन और अन्य हितधारक भाग लेंगे। यह कार्यक्रम उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण से एकीकृत मूल्य-श्रृंखला मॉडल की ओर बढ़ने का संदेश देगा।

सम्मेलन में क्या-क्या होगा

सम्मेलन का एक प्रमुख आकर्षण ‘मध्यप्रदेश फिशरीज इन्वेस्टमेंट एंड एक्सपोर्ट गाइडलाइंस 2026’ का विमोचन होगा। यह नीति मत्स्य मूल्य-श्रृंखला के प्रमुख क्षेत्रों में निवेश को सुगम बनाएगी, जिनमें हैचरी, मत्स्य बीज और आहार, जलाशय एवं केज मत्स्यपालन, जलीय पशु स्वास्थ्य, प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, मूल्य संवर्धन और बाजार विकास शामिल हैं।

कार्यक्रम में अंतर्देशीय राज्यों की निर्यात क्षमता पर मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) का भी विमोचन होगा और एकीकृत केज कल्चर इकाइयों का वर्चुअल उद्घाटन किया जाएगा। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह मध्यप्रदेश में जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास के लिए प्रशासनिक स्वीकृति सौंपेंगे।

उद्यम विकास और बाजार संपर्क पर जोर

सरकारी बयान में कहा गया है कि विचार-विमर्श उद्यम विकास, वित्त तक पहुंच, बाजार संपर्क और अंतर्देशीय मत्स्य मूल्य-श्रृंखला में सहयोग के अवसरों पर केंद्रित होगा, जिसमें अंतर्देशीय राज्यों को मत्स्यपालन निवेश और निर्यात इकोसिस्टम से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जाएगा।

केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश को ‘रिजर्वॉयर फिशरीज क्लस्टर’ के रूप में अधिसूचित किया है। यानी राज्य के बड़े जलाशयों को संगठित मत्स्यपालन के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, जलाशयों में केज कल्चर और वैज्ञानिक प्रबंधन से उत्पादन कई गुना बढ़ सकता है, जिससे मछुआरों की आय में सीधा इजाफा होगा।

केज कल्चर: जलाशयों से ज्यादा उत्पादन की आधुनिक तकनीक

केज कल्चर मत्स्यपालन की वह आधुनिक पद्धति है जिसमें जलाशय या झील के भीतर जालीदार पिंजड़ों (केज) में मछलियों का पालन किया जाता है। इसमें मछलियों को नियंत्रित आहार, स्वास्थ्य प्रबंधन और सुरक्षा मिलती है, जिससे प्रति इकाई जल-क्षेत्र से उत्पादन पारंपरिक तरीकों की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है। बड़े जलाशयों वाले राज्यों के लिए यह तकनीक विशेष रूप से उपयुक्त है, क्योंकि इसमें नई भूमि की आवश्यकता नहीं होती और मौजूदा जल-संसाधनों का ही बेहतर उपयोग होता है।

सम्मेलन में एकीकृत केज कल्चर इकाइयों के वर्चुअल उद्घाटन का कार्यक्रम इसी दिशा में एक कदम है। विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यप्रदेश के बड़े जलाशयों — जैसे तवा, इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर जैसे जलाशयों — में वैज्ञानिक केज कल्चर से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। हालांकि यह तकनीक पूंजी-गहन है, इसलिए FFPO और सहकारी समितियों के माध्यम से सामूहिक निवेश का मॉडल छोटे मछुआरों के लिए इसे सुलभ बना सकता है।

राष्ट्रीय परिदृश्य: मत्स्यपालन बना ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत का मत्स्य उत्पादन 197.75 लाख टन तक पहुंच गया, जिसमें से 151.60 लाख टन अंतर्देशीय मत्स्यपालन से आया — यानी देश के कुल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई। वर्ष 2025-26 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 73,890 करोड़ रुपये मूल्य का रहा।

यह आंकड़े बताते हैं कि मत्स्यपालन अब केवल तटीय राज्यों तक सीमित नहीं रहा; मध्यप्रदेश जैसे अंतर्देशीय राज्यों में भी यह ग्रामीण आजीविका और निर्यात का बड़ा माध्यम बन रहा है। कोल्ड-चेन, प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यात मानकों से जुड़ने पर मछुआरों को बेहतर दाम और स्थायी आय मिल सकती है।

मध्यप्रदेश के लिए क्यों अहम है यह सम्मेलन

मध्यप्रदेश में नदियों, जलाशयों, तालाबों और अमृत सरोवरों का विशाल जाल है, जो संगठित मत्स्यपालन की अपार संभावना देता है। ‘रिजर्वॉयर फिशरीज क्लस्टर’ के रूप में अधिसूचना के बाद राज्य को केंद्रीय योजनाओं और निवेश का विशेष लाभ मिलेगा। इसका सीधा अर्थ है कि अब राज्य के बड़े जलाशयों को एक क्लस्टर के रूप में विकसित किया जाएगा — जहां बीज उत्पादन, आहार इकाइयां, कोल्ड-चेन और प्रसंस्करण सुविधाएं एक ही इकोसिस्टम में उपलब्ध होंगी।

सम्मेलन में जारी होने वाली निवेश और निर्यात दिशानिर्देश नीति से निजी निवेशकों को स्पष्ट रोडमैप मिलेगा — हैचरी से लेकर प्रसंस्करण और निर्यात तक हर कड़ी में। FFPO और सहकारी समितियों की भागीदारी से छोटे मछुआरे भी संगठित बाजार से जुड़ सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि केज कल्चर, बीज-आहार की गुणवत्ता और कोल्ड-चेन जैसी आधुनिक तकनीकों के प्रसार से मध्यप्रदेश मत्स्य उत्पादन में अग्रणी राज्यों में शुमार हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में मत्स्यपालन पारंपरिक रूप से पिछड़े वर्गों और ग्रामीण गरीबों की आजीविका का आधार रहा है। संगठित मूल्य-श्रृंखला से जुड़ने पर इन परिवारों की आय में स्थिरता आएगी और पलायन पर भी अंकुश लगेगा। निर्यात मानकों के अनुरूप प्रसंस्करण से राज्य की मछली अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकेगी, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जन में भी योगदान होगा।

आगे क्या

सम्मेलन के बाद निवेश प्रस्तावों और समझौता ज्ञापनों पर नजर रहेगी। जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास को मिली प्रशासनिक स्वीकृति के बाद जमीनी क्रियान्वयन की गति भी देखी जाएगी। यदि नीति और निवेश साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश के हजारों मछुआरा परिवारों की आय बढ़ने और राज्य को मत्स्य निर्यात मानचित्र पर नई पहचान मिलने की उम्मीद है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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