इंदौर ब्यूरो।
शहर में पानी की बर्बादी रोकने के लिए महापौर पुष्यमित्र भार्गव सोमवार तड़के सड़कों पर उतरे। उन्होंने पार्श्वनाथ, विनय नगर, जैन कॉलोनी और लोकमान्य नगर में रहवासियों से संवाद कर पानी का अपव्यय रोकने की अपील की। इस दौरान जल कार्य प्रभारी अभिषेक शर्मा बबलू, पार्षद योगेश गेदर और नगर निगम के जोनल अधिकारी मौजूद रहे। महापौर ने गलियों में घूमकर लोगों से सीधे बात की और उन्हें पानी की बचत का महत्व समझाया। यह दौरा निगम मुख्यालय पर हुई बैठक में लिए गए निर्णयों के बाद मैदानी अमल की दिशा में अगला कदम माना जा रहा है।
गर्मी में बढ़ती जरूरत, बर्बादी का नुकसान शहर को ही
महापौर ने कहा कि गर्मी में पानी की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे में पानी की बर्बादी का नुकसान अंततः शहरवासियों को ही उठाना पड़ेगा। हर घर में पानी का इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक होना चाहिए, ताकि भविष्य में जल संकट से बचा जा सके। महापौर का कहना है कि पानी की हर बूंद की कीमत है और जो पानी आज बर्बाद होता है, उसकी कमी कल पूरे शहर को महसूस होती है। खासकर गर्मी के महीनों में जब मांग अपने चरम पर होती है, तब बर्बादी की वजह से कई इलाकों में आपूर्ति पर दबाव बढ़ जाता है। इसलिए निगम का जोर इस बात पर है कि लोग अपनी दैनिक आदतों में ही बचत की शुरुआत करें — नल खुला छोड़ना, जरूरत से ज्यादा पानी बहाना और पीने के पानी का गलत इस्तेमाल रोकना।
पहले 2-3 बार समझाइश, फिर वीडियो बनाकर चालान
महापौर ने एनजीओ की टीम को निर्देश दिए कि पानी बर्बाद करने वालों को दो-तीन बार समझाइश दी जाए। इसके बाद भी सुधार नहीं होने पर वीडियो बनाकर नियमानुसार चालानी कार्रवाई की जाए। निगम की यह रणनीति पहले जागरूकता और फिर कार्रवाई की है। एनजीओ की टीमें घर-घर जाकर लोगों को समझाएंगी कि पानी का अपव्यय कैसे हो रहा है और उसे कैसे रोका जा सकता है। दो-तीन बार समझाने के बाद भी जो लोग नहीं मानेंगे, उनके खिलाफ सबूत के तौर पर वीडियो बनाकर चालान की कार्रवाई होगी। वीडियो का मकसद कार्रवाई को पारदर्शी बनाना है, ताकि किसी पर गलत कार्रवाई का आरोप न लगे और नियम तोड़ने वाले के पास भी अपनी बात रखने का मौका रहे।
आरओ के वेस्ट पानी का दोबारा इस्तेमाल
महापौर ने आरओ से निकलने वाले वेस्ट पानी को पौधों में डालने, गाड़ी और कपड़े धोने जैसे कामों में दोबारा इस्तेमाल करने की सलाह दी। इससे पीने योग्य पानी की अनावश्यक खपत कम की जा सकती है। आरओ सिस्टम से शुद्ध पानी के साथ-साथ एक बड़ा हिस्सा वेस्ट पानी के रूप में निकलता है, जिसे आमतौर पर नाली में बहा दिया जाता है। महापौर ने कहा कि इस पानी को पौधों की सिंचाई, गाड़ी धोने और कपड़े धोने जैसे कामों में इस्तेमाल किया जाए तो पीने के पानी की बचत होगी। यह सलाह खासकर उन घरों के लिए अहम है जहां आरओ का इस्तेमाल रोजाना होता है। छोटे-छोटे बदलावों से ही शहर के स्तर पर पानी की बड़ी बचत संभव है।
दीपावली तक निगरानी अभियान और घास की कटाई
महापौर ने एनजीओ की टीम को दीपावली तक अभियान का चार्ट तैयार करने और नियमित निगरानी के निर्देश दिए। जिन स्थानों पर हरी घास दिखाई दे रही है, वहां दो-दो दिन का समय तय कर उसकी कटाई कराने को भी कहा। निगरानी अभियान का मतलब है कि पानी की बर्बादी पर नजर लगातार बनी रहेगी, न कि एक दिन के दौरे तक सीमित रहेगी। चार्ट के जरिए यह तय होगा कि किस इलाके में कब और कौन सी टीम जाएगी। घास की कटाई का निर्देश सफाई अभियान से जुड़ा है — सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर उगी घास हटाने से इलाके साफ दिखेंगे और दीपावली से पहले शहर की सफाई का लक्ष्य भी पूरा होगा। दो-दो दिन के स्लॉट में कटाई कराने से काम समय पर और व्यवस्थित तरीके से होगा।

बैठक के निर्णयों का मैदानी अमल
इससे पहले निगम मुख्यालय पर हुई बैठक में पानी की बर्बादी रोकने के लिए कई निर्णय लिए गए थे। नलों पर मोटर लगाकर पानी खींचने वालों की मोटर जब्त करने, सरकारी बोरिंग से कब्जे हटाने, सभी 85 वार्डों में प्याऊ लगाने और तालाबों के पास हाइड्रेंट बनाने के लिए जगह चिह्नित करने के निर्देश दिए गए थे। सोमवार तड़के का दौरा उन्हीं निर्णयों को जमीन पर उतारने की कड़ी है। बैठक में लिए गए फैसलों के बाद अब निगम की टीमें मैदान में उतरकर लोगों से सीधा संवाद कर रही हैं। नगर निगम का जोर लोगों को जागरूक करने के साथ पानी की बर्बादी पर रोक लगाने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने पर है।
आगे क्या
दीपावली तक चलने वाले निगरानी अभियान के दौरान एनजीओ की टीमें नियमित रूप से इलाकों का दौरा करेंगी और पानी की बर्बादी के मामलों पर नजर रखेंगी। समझाइश के बाद भी नहीं मानने वालों पर वीडियो सबूत के साथ चालान की कार्रवाई होगी। प्याऊ और हाइड्रेंट के लिए जगह चिह्नित करने का काम भी साथ-साथ चलेगा। आने वाले दिनों में यह देखा जाएगा कि जागरूकता अभियान से लोगों की आदतों में कितना बदलाव आता है और पानी की बर्बादी के मामलों में कितनी कमी आती है।
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