वरिष्ठ संपादक- अनीता चौबे भोपाल ब्यूरो
रामसर का सम्मान हो या भोपाल की झीलों का गौरव, सवाल एक ही है—जब प्राकृतिक धरोहरें ही सुरक्षित नहीं, तो संरक्षण के दावों का आखिर मतलब क्या है?
भोपाल को झीलों का शहर कहा जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सचमुच इसकी झीलों को बचाना चाहते हैं या केवल उनके नाम पर अपनी पहचान चमकाना चाहते हैं? जिस शहर की खूबसूरती कभी उसकी झीलों, पहाड़ियों और हरियाली से पहचानी जाती थी, वहां यदि प्रकृति पर बढ़ते दबाव को विकास की कीमत मानकर स्वीकार किया जाने लगे, तो यह चिंता की बात है। आखिर कैसा विकास है, जिसमें इमारतें बढ़ने पर खुशियां मनाई जाती हैं, लेकिन प्राकृतिक धरोहरों के भविष्य पर उठते सवालों को उतनी गंभीरता नहीं मिलती?
चंडीगढ़ की सुखना झील को रामसर स्थल का दर्जा मिलना निश्चित रूप से गर्व का विषय है। मगर इस सम्मान के पीछे छिपा संदेश भी समझना होगा। अंतरराष्ट्रीय पहचान किसी झील को संकटों से मुक्त नहीं करती, बल्कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी और बढ़ा देती है। मध्यप्रदेश और खासकर भोपाल के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है। सम्मान हासिल करना उपलब्धि है, लेकिन उस सम्मान के योग्य प्राकृतिक विरासत को बचाए रखना असली परीक्षा है।
भोपाल का बड़ा तालाब केवल पर्यटन का ठिकाना नहीं, शहर की जीवनरेखा है। उसका स्वास्थ्य आसपास के जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक जलप्रवाह और हरियाली से जुड़ा है। ऐसे में प्रदूषण, अतिक्रमण, अनियोजित निर्माण और जलनिकासी में बाधाओं की आशंकाओं को नजरअंदाज करके झील संरक्षण का दावा कैसे किया जा सकता है? केवल किनारों को चमका देने, सफाई अभियान चलाने और आकर्षक तस्वीरें प्रस्तुत करने से झीलें नहीं बचतीं। असली सवाल उन कारणों पर कार्रवाई का है, जो उनके अस्तित्व को कमजोर करते हैं।
मध्यप्रदेश के रामसर स्थलों की पहचान पर गर्व होना चाहिए, लेकिन क्या उनकी सेहत का हिसाब भी उसी गंभीरता से रखा जा रहा है? जल गुणवत्ता की स्थिति क्या है, गाद और प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए क्या कदम उठे हैं, प्राकृतिक जलमार्ग कितने सुरक्षित हैं और नियम तोड़ने वालों पर क्या कार्रवाई हुई है? इन सवालों के जवाब जनता के सामने आने चाहिए। पर्यावरण संरक्षण कोई ऐसा विषय नहीं, जिसमें घोषणाएं तो सार्वजनिक हों, लेकिन परिणामों का हिसाब देना जरूरी न समझा जाए।
भोपाल गैस त्रासदी का दर्द झेल चुका शहर है। यहां के लोगों ने पर्यावरणीय लापरवाही की भयावह कीमत देखी है। ऐसे में स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और हरियाली का महत्व समझाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। फिर भी यदि प्राकृतिक संपदा पर दबाव बढ़ता है और संरक्षण की चिंता विकास की चमक के पीछे दब जाती है, तो यह हमारी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सड़कें बनें, सुविधाएं बढ़ें, पर्यटन को प्रोत्साहन मिले—इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन विकास के नाम पर प्रकृति की कीमत चुकाना जरूरी क्यों हो? झीलों का जलग्रहण क्षेत्र सुरक्षित रखना, गंदे पानी के प्रवेश पर रोक लगाना, प्राकृतिक जलप्रवाह बहाल करना और निर्माण संबंधी नियमों का सख्ती से पालन कराना प्रशासन की बुनियादी जिम्मेदारी है। इसमें लापरवाही हो तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। जनता को केवल संरक्षण का संदेश देना पर्याप्त नहीं; प्रशासन को अपने काम के नतीजे भी दिखाने होंगे।
भोपाल की झीलें शहर की शोभा बढ़ाने वाली सजावटी वस्तुएं नहीं हैं कि जब मन हुआ उन्हें संवारा और जब जरूरत पड़ी उनके अस्तित्व को ही नजरअंदाज कर दिया। वे इस शहर की पहचान, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर हैं। उन्हें खोकर हासिल किया गया विकास अंततः शहर को भीतर से खोखला ही करेगा।
अब फैसला साफ होना चाहिए—भोपाल को ऐसा शहर बनाना है जिसकी पहचान केवल कंक्रीट के विस्तार से हो, या ऐसा भी, जहां झीलों में स्वच्छ पानी, किनारों पर हरियाली और प्रकृति में जीवन बचा रहे। रामसर का सम्मान हो या भोपाल का गौरव, उनकी सार्थकता सरकारी दावों से नहीं, धरातल पर होने वाले संरक्षण से तय होगी।
झीलें बचेंगी, तभी भोपाल बचेगा। वरना एक दिन हमारे पास झीलों के शहर का नाम तो रह जाएगा, लेकिन उस नाम को सार्थक बनाने वाली प्रकृति शायद नहीं।
