स्वरूप वर्णन
मां ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा का द्वितीय स्वरूप हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार ये श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। मां के दाएं हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है — यही तपस्विनी का स्वरूप है। मान्यता है कि ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तपस्या का आचरण करने वाली।

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पौराणिक कथा
कथा है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने अत्यंत कठोर तपस्या की थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार मां ने वर्षों तक घोर तप किया — कभी केवल फल-फूल पर रहीं, तो कभी निर्जल उपवास किया। मान्यता है कि उनकी इस अटल तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। मां ब्रह्मचारिणी की यह कथा बताती है कि सच्ची निष्ठा और धैर्य से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता।
पूजा विधि
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विधान है। प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थान पर गंगाजल छिड़ककर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। श्वेत या हल्के वस्त्रों में सफेद फूल, चंदन और अक्षत अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर मां के मंत्र का जप करें। भोग लगाने के बाद देवी की आरती करें और प्रसाद बांटें।
भोग
मान्यता के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी को चीनी और मिश्री का भोग प्रिय है। नवरात्रि के दूसरे दिन चीनी या मिश्री का भोग लगाने की परंपरा है। मान्यता है कि इस भोग से मां प्रसन्न होती हैं और भक्त के जीवन में मधुरता व सुख-शांति आती है।
मंत्र
मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र है — ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥ पूजा के दौरान इस मंत्र का 108 बार जप शुभ माना जाता है।
महत्व
नवरात्रि का दूसरा दिन तप और संयम का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी की आराधना से साधक में धैर्य, अनुशासन और आत्मसंयम बढ़ता है। मान्यता है कि विद्यार्थियों के लिए मां का यह स्वरूप विशेष फलदायी है। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से मन की चंचलता शांत होती है और लक्ष्य की ओर एकाग्रता मिलती है।
