इंदौर ब्यूरो
सार: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के आदेश के बाद शहर की यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए सात सदस्यीय समिति गठित कर दी गई है। अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी की अध्यक्षता वाली इस समिति की पहली बैठक 31 अक्टूबर को होगी, जिसमें सभी सदस्यों से ठोस सुझावों और कार्ययोजना के साथ आने को कहा गया है।
इंदौर की सड़कों पर रोजाना लगने वाले जाम से जूझ रहे शहरवासियों के लिए यह खबर राहत की उम्मीद लेकर आई है। अधिकारियों ने गुरुवार को समिति के गठन की जानकारी दी। समिति का काम शहर के यातायात प्रबंधन में सुधार के उपाय सुझाना और संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा, ताकि अदालत के निर्देश केवल कागजों पर न रह जाएं।
लंबे समय से अदालत में शहर के ट्रैफिक की बदहाली का मामला चल रहा है। अदालत पहले भी कई निर्देश दे चुकी है, लेकिन जमीनी हालात में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा। इसी पृष्ठभूमि में अब एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई है, ताकि फैसले एक ही मंच पर हों और उनकी निगरानी भी हो सके।
समिति का गठन और पहली बैठक
अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। समिति की पहली बैठक 31 अक्टूबर को बुलाई गई है। इस बैठक में सदस्यों को यातायात व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस सुझावों और कार्ययोजना के साथ उपस्थित रहने को कहा गया है। यानी पहली ही बैठक से समिति से ठोस प्रस्तावों की उम्मीद की जा रही है, न कि केवल औपचारिक चर्चा की।
समिति का लक्ष्य साफ है — इंदौर को ट्रैफिक जाम से निजात दिलाना। इसके लिए समिति शहर के यातायात प्रबंधन में सुधार के आवश्यक उपायों पर काम करेगी और संबंधित अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेगी। अलग-अलग विभागों के फैसले अब एक मंच पर आएंगे, जिससे जिम्मेदारी तय करना और काम की निगरानी करना आसान होगा।
समिति में कौन-कौन शामिल है
समिति की संरचना ऐसी रखी गई है कि यातायात से जुड़ा हर पहलू इसमें शामिल हो। अध्यक्ष के अलावा इसमें जिलाधिकारी, नगर निगम आयुक्त, इंदौर स्मार्ट सिटी डेवलपमेंट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, यातायात पुलिस के उपायुक्त, एक शासकीय अधिवक्ता और एक सिविल इंजीनियर शामिल हैं।
जिलाधिकारी जिला प्रशासन के स्तर पर समन्वय की जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि नगर निगम आयुक्त सड़कों, पार्किंग और अतिक्रमण जैसे मसलों से जुड़े फैसलों में अहम भूमिका निभाएंगे। स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सिग्नल व्यवस्था और तकनीकी निगरानी से जुड़े पहलुओं को देखेंगे, और यातायात पुलिस के उपायुक्त मैदानी अमल की जिम्मेदारी संभालेंगे। शासकीय अधिवक्ता कानूनी पहलुओं को देखेंगे और सिविल इंजीनियर तकनीकी सलाह देंगे। इस विविध संरचना से उम्मीद है कि किसी भी पहलू पर विचार छूटेगा नहीं।
अदालत ने पहले क्या निर्देश दिए थे
गौरतलब है कि उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने 13 अक्टूबर को एक आदेश जारी कर शहर की यातायात व्यवस्था में सुधार के लिए तत्काल कदम उठाने और प्रमुख चौराहों पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात करने के निर्देश दिए थे। अदालत के इस आदेश के अनुपालन में ही यह समिति गठित की गई है।
इसके बाद जारी विस्तृत आदेश में समिति गठित करने के साथ-साथ कई और निर्देश भी दिए गए। शहर के प्रमुख चौराहों पर कम से कम चार जवानों की तैनाती सुनिश्चित करने को कहा गया है। गलत दिशा में वाहन चलाने वालों के खिलाफ मौके पर ही कार्रवाई करने, जुर्माना लगाने या जरूरत पड़ने पर वाहन जब्त करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सुनवाई के दौरान प्रशासनिक न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की पीठ ने सरकार से पुलिस बल की भर्ती को लेकर जानकारी भी मांगी थी। अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा था कि पिछले वर्षों में कितनी भर्तियां की गईं और ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए। यातायात सुधार में सरकार की लापरवाही पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव को 30 नवंबर 2026 को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश भी दिया है। अदालत उनसे यातायात सुधार के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगेगी।
मामला कैसे शुरू हुआ
यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें शहर की यातायात व्यवस्था की खामियों को अदालत के सामने रखा गया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कई गंभीर मुद्दे उठाए गए। शहर के सिग्नलों के बीच समन्वय की कमी का मुद्दा उठा — बड़ी संख्या में सिग्नल एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं, जिससे यातायात का प्रवाह बाधित होता है।
पार्किंग की अपर्याप्त व्यवस्था भी अदालत के सामने रखी गई। याचिकाकर्ता ने बताया कि शहर में केवल 26 चिह्नित पार्किंग स्थल हैं, जबकि नागपुर में 51, कानपुर में 42 और लखनऊ में 62 पार्किंग स्थल हैं। पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से नागरिक फुटपाथ पर वाहन पार्क करते हैं, और छह लेन की सड़क की दो लेन सिर्फ वाहनों की पार्किंग से भर जाती हैं। मल्टीलेवल पार्किंग बनाए गए हैं, लेकिन वहां अंधेरा रहने जैसी शिकायतें भी सामने आईं।
यातायात पुलिस बल के रिक्त पदों पर अब तक नियुक्ति नहीं होने पर भी अदालत ने नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने बताया कि इस संबंध में शासन को पत्र लिखा जा चुका है, लेकिन अदालत ने कहा कि यह स्थिति ठीक नहीं है और शासन को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। शासन की ओर से यह भी बताया गया कि शहर में लेफ्ट टर्न चौड़ीकरण का काम तेजी से चल रहा है और जिन चौराहों पर काम हो चुका है, उनकी सूची भी पेश की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से यह प्रस्ताव भी रखा गया था कि अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी को यातायात सुधार और न्यायालयीन आदेशों के अनुपालन के लिए एकल समन्वय एवं पर्यवेक्षण अधिकारी बनाया जाए, और सभी विभाग उन्हें दैनिक प्रगति रिपोर्ट सौंपें। विभागों को आपसी समन्वय से विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर अदालत में पेश करने के लिए 21 दिन का समय देने का अनुरोध भी किया गया था। अब गठित समिति के रूप में इस प्रस्ताव को एक संस्थागत शक्ल मिल गई है।
हूटर-सायरन, नंबर प्लेट और ध्वनि प्रदूषण पर निर्देश
यातायात के साथ-साथ अदालत ने हूटर-सायरन लगी गाड़ियों और गलत या बिना नंबर प्लेट वाले वाहनों का मुद्दा भी उठाया है। याचिकाओं में शहर की यातायात व्यवस्था को प्रभावित करने वाले ऐसे वाहनों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय सामने आया है।
ध्वनि प्रदूषण पर भी अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। शहर के साइलेंस जोन की सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित करने और थानों में साउंड मीटर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इससे ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण में मदद मिलेगी और नागरिकों को राहत मिलेगी। अदालत ने यह भी कहा है कि जनता से सुझाव मांगे जाएं कि किन प्रमुख स्थानों को साइलेंस जोन घोषित किया जाए।
इसके अलावा अदालत ने इंदौर नगर निगम से यह भी पूछा है कि क्या आवासीय भवनों के नक्शों की स्वीकृति के समय कम से कम दो वाहनों की पार्किंग अनिवार्य की जा सकती है। यह कदम पार्किंग की समस्या को कम करने और ट्रैफिक जाम से निपटने में सहायक होगा।
शहरवासियों को क्या फायदा होगा
अगर समिति की सिफारिशें जमीन पर उतरती हैं, तो इंदौरवासियों को रोजमर्रा के ट्रैफिक से राहत मिल सकती है। प्रमुख चौराहों पर पुलिस की मौजूदगी बढ़ने से यातायात नियमों का पालन कराने और वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने में सहायता मिलेगी। व्यस्त चौराहों पर अक्सर वाहनों का दबाव अधिक रहता है, ऐसे में यातायात पुलिस की सक्रिय तैनाती से जाम की स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
सिग्नलों के बीच समन्वय, पार्किंग की व्यवस्था और अतिक्रमण पर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर एक ही मंच पर फैसले होने से काम में तेजी आने की उम्मीद है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब इस काम की निगरानी अदालत के स्तर पर हो रही है, जिससे विभागों पर जवाबदेही का दबाव बना रहेगा। आने वाले समय में शहर पर यातायात का दबाव और बढ़ेगा, ऐसे में अभी उठाए गए कदम भविष्य की तैयारी के लिहाज से भी अहम हैं।
आगे क्या होगा
अब सबकी नजर 31 अक्टूबर को होने वाली समिति की पहली बैठक पर रहेगी। इस बैठक में सदस्य अपने-अपने सुझाव और कार्ययोजना रखेंगे, जिसके बाद यह साफ होगा कि समिति किन उपायों को प्राथमिकता देती है। समिति नियमित रूप से यातायात सुधार के उपायों की समीक्षा करेगी और उनकी निगरानी सुनिश्चित करेगी।
इसके बाद 30 नवंबर को होने वाली सुनवाई में गृह विभाग के प्रमुख सचिव की उपस्थिति और प्रशासन की ओर से पेश किए जाने वाले जवाब पर नजर रहेगी। अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि ट्रैफिक जाम, पुलिस बल की कमी और नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। इंदौरवासी उम्मीद कर रहे हैं कि इस पहल से उन्हें रोजाना के ट्रैफिक से राहत मिलेगी।
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