नई दिल्ली ब्यूरो
सार: कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 543 ब्रांड दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत में बड़ी कटौती की गई है। नई दरें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी और कुछ दवाएं 90 प्रतिशत से भी ज्यादा सस्ती हो जाएंगी, हालांकि सबसे महंगी पेटेंट दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
कैंसर का इलाज लंबे समय तक चलता है और हर महीने दवाओं का बिल परिवारों के बजट पर भारी पड़ता है। ऐसे में दवाओं की कीमतों में यह कटौती उन लाखों परिवारों के लिए राहत की खबर है, जो इलाज के खर्च से जूझ रहे हैं। यह फैसला अचानक नहीं आया है। इसके पीछे दवा नियामक की एक सोची-समझी प्रक्रिया है, जिसमें व्यापारियों के मार्जिन पर सीमा लगाई गई है। इस खबर में समझिए कि क्या बदला है, किन दवाओं के दाम घटे हैं, किनके नहीं घटे हैं और 9 नवंबर से मरीजों को क्या करना चाहिए।
क्या हुआ है, कब से लागू होगा
देश की दवा मूल्य नियामक संस्था ने कैंसर की दवाओं की संशोधित अधिकतम खुदरा कीमतों की सूची जारी की है। इस सूची में 543 ब्रांड और पैक प्रविष्टियां शामिल हैं। इनमें से 397 प्रविष्टियों की कीमत कम हुई है, जबकि 146 प्रविष्टियों की कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ है। करीब 97 प्रविष्टियों में 70 प्रतिशत या उससे ज्यादा की कटौती हुई है, 50 प्रविष्टियों में 80 प्रतिशत या उससे ज्यादा की कटौती हुई है और पांच प्रविष्टियों में 90 प्रतिशत से ज्यादा की कटौती हुई है।
नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी। इसका मतलब है कि उस तारीख से दुकानों और अस्पतालों में इन दवाओं की संशोधित कीमत ही लागू होनी चाहिए। यह सूची कंपनियों की ओर से 27 अक्टूबर 2026 तक दी गई जानकारी पर आधारित है और जैसे-जैसे कंपनियां संशोधित कीमतें जमा करेंगी, सूची को अद्यतन किया जाएगा। इसलिए किसी एक दवा की कीमत की पुष्टि के लिए हमेशा ताजा सूची देखना जरूरी होगा।
ट्रेड मार्जिन कैप क्या है और यह कीमत कैसे घटाता है
इस पूरी कवायद का केंद्र ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन है। सरल भाषा में समझें तो दवा की कीमत में एक बड़ा हिस्सा उस मार्जिन का होता है, जो निर्माता से लेकर थोक विक्रेता, वितरक और खुदरा विक्रेता तक की श्रृंखला में जुड़ता है। नियामक ने 137 गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा कीमत के 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है। यह सीमा जीएसटी को छोड़कर लागू होती है।
यह कदम 17 अक्टूबर 2026 को उठाया गया था। इसके तहत निर्माताओं को गजट अधिसूचना के प्रकाशन के सात दिन के भीतर नियामक को अपनी संशोधित कीमतों की जानकारी देनी थी। साथ ही निर्माताओं को अपनी वेबसाइट पर मूल्य सूची प्रदर्शित करने और खुदरा विक्रेताओं व अस्पतालों तक इसे व्यापक रूप से पहुंचाने के निर्देश दिए गए थे। अस्पतालों को भी अपनी वेबसाइट पर संशोधित कीमतें प्रमुखता से प्रदर्शित करनी हैं। राज्य औषधि नियंत्रकों को निर्माताओं, विक्रेताओं, अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों से अनुपालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
इस व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अस्पतालों से सीधे आपूर्ति को भी इस दायरे में रखा गया है। कैंसर की दवाओं की एक बड़ी आपूर्ति सीधे अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को होती है, इसलिए उन संस्थानों को भी संशोधित कीमतों से आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। यही वजह है कि यह फैसला सिर्फ दवा की दुकानों तक सीमित नहीं है, बल्कि अस्पताल के बिल पर भी असर डाल सकता है।

किन दवाओं के दाम कितने घटे
कीमतों में सबसे ज्यादा गिरावट उन दवाओं में देखने को मिली है, जिनके कई ब्रांड बाजार में मौजूद हैं और जिनमें प्रतिस्पर्धा ज्यादा है। कुछ उदाहरण इस बदलाव की तस्वीर साफ करते हैं। ध्यान रहे कि हर उदाहरण में दवा का नाम, उसकी ताकत और पैक का आकार अलग-अलग हो सकता है, इसलिए तुलना हमेशा एक ही ब्रांड, ताकत और पैक के आधार पर करनी चाहिए।
स्तन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली पाल्बोसिक्लिब की एक ब्रांड की कीमत 40,421.33 रुपये से घटकर 2,720 रुपये हो गई है। कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाले थायोटेपा इंजेक्शन की 100 मिलीग्राम वायल की कीमत 80,072 रुपये से घटकर 7,150 रुपये हो गई है। स्तन कैंसर की दवा एनार्जोल की 10 गोलियों का पैक 695.76 रुपये से घटकर 73 रुपये हो गया है। एज़ासाइटिन इंजेक्शन की कीमत 6,337 रुपये से घटकर 1,495.04 रुपये हो गई है।
बेवासिज़ुमैब की 4 मिलीलीटर वायल की कीमत 21,767.70 रुपये से घटकर 5,930.13 रुपये हो गई है, जबकि उसी दवा के 400 मिलीग्राम इंजेक्शन के एक अन्य पैक की कीमत 65,205 रुपये से घटकर 8,957 रुपये हो गई है। डासाटिनिब की 60 गोलियों वाले पैक की कीमत 2,812.50 रुपये से घटकर 1,085.93 रुपये हो गई है, और उसी दवा के 70 मिलीग्राम वाले 60 गोलियों के एक अन्य पैक की कीमत 17,811 रुपये से घटकर 1,808 रुपये हो गई है। प्रोस्टेट कैंसर में इस्तेमाल होने वाली एबिरेटेरोन की 120 गोलियों का पैक 36,089 रुपये से घटकर 4,064 रुपये हो गया है।
डेनोसुमैब इंजेक्शन की कीमत 22,031.25 रुपये से घटकर 5,941 रुपये, एनज़ालुटामाइड कैप्सूल के 28 कैप्सूल वाले पैक की कीमत 6,578.20 रुपये से घटकर 2,232 रुपये, एर्लोटिनिब की 30 गोलियों की बोतल की कीमत 4,637.45 रुपये से घटकर 2,008 रुपये, फ्लूडाराबिन इंजेक्शन की कीमत 14,235 रुपये से घटकर 2,432 रुपये और फुल्वेस्ट्रैंट इंजेक्शन की कीमत 26,072.16 रुपये से घटकर 5,491 रुपये हो गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि जिन दवाओं में पहले मार्जिन बहुत ज्यादा था, वहां कटौती भी सबसे ज्यादा हुई है।
कहां राहत नहीं मिली: महंगी पेटेंट दवाएं जस की तस
इस सूची का दूसरा पहलू उतना ही महत्वपूर्ण है। कई नई और महंगी दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से कई दवाएं एक ही कंपनी से मिलती हैं और इन्हें पेटेंट दवाओं के रूप में देखा जाता है, जहां निर्माता की तय कीमत ही शुरुआती कीमत होती है और मार्जिन कैप से वह कीमत नहीं घटती।
उदाहरण के तौर पर फेफड़ों के कैंसर में इस्तेमाल होने वाली ओसिमर्टिनिब की 30 गोलियों का पैक 4.16 लाख रुपये पर ही बना हुआ है। एलेक्टिनिब का पैक 4.31 लाख रुपये, ट्रेमेलिमुमैब इंजेक्शन 4.18 लाख रुपये, डॉस्टार्लिमैब 3.91 लाख रुपये, इवोसिडेनिब की 60 गोलियों का पैक 6.58 लाख रुपये और सेलुमेटिनिब की 60 कैप्सूल का पैक 10.22 लाख रुपये पर ही है। इम्यूनोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली पेम्ब्रोलिज़ुमैब की एक वायल की कीमत करीब 2.16 लाख रुपये पर बनी हुई है। स्तन कैंसर की राइबोसिक्लिब भी 24,435 रुपये पर अपरिवर्तित है।
विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार करीब 37 पेटेंट दवाओं से जुड़े 65 फॉर्मूलेशन की कीमत में कोई बदलाव नहीं हुआ है। मरीज संगठनों और विशेषज्ञों का तर्क है कि जिन दवाओं की कीमत सबसे ज्यादा है और जिन पर परिवारों का सबसे ज्यादा बोझ है, वहां यह कदम पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि मरीज सहायता कार्यक्रमों के तहत मुफ्त दी जाने वाली दवाओं की मात्रा को इस गणना से बाहर रखा गया है, जिससे कुछ महंगी दवाओं की कीमतें प्रभावित नहीं हुईं। कुछ विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया है कि ऐसी दवाओं के लिए सरकार की ओर से कीमत पर बातचीत, प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य खरीद के उपायों पर विचार करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट की पृष्ठभूमि और 2019 का प्रयोग
कीमतों में यह कटौती ऐसे समय में आई है, जब अदालत में भी दवाओं की ऊंची कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में मार्जिन को लेकर सवाल उठे थे। अदालत ने दवा की थोक कीमत और मरीज तक पहुंचने वाली कीमत के बीच के बड़े अंतर पर चिंता जताई थी। नियामक की यह कार्रवाई उसी पृष्ठभूमि में देखी जा रही है, जहां इलाज की लागत को कम करने की मांग लंबे समय से उठ रही थी।
यह पहली बार नहीं है, जब इस तरह का प्रयोग हुआ है। 2019 में भी 42 कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित किया गया था। उस प्रयोग के बाद 526 ब्रांडों की कीमतों में 90 प्रतिशत तक की कमी आई थी। मौजूदा कवायद उसी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाती है, लेकिन इसका दायरा कहीं बड़ा है। इस बार 137 दवाओं को शामिल किया गया है, जिनमें 20 से ज्यादा प्रकार के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली इम्यूनोथेरेपी दवाएं, स्तन और प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों के लिए डेनोसुमैब, न्यूट्रोपेनिया से बचाव के लिए पेगफिलग्रास्टिम और कोलन, अंडाशय व गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के इलाज के लिए बेवासिज़ुमैब जैसी दवाएं शामिल हैं। विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर तैयार की गई इस सूची को समय-समय पर अद्यतन भी किया जाएगा।
मरीजों और परिवारों के लिए इसका क्या मतलब है
कैंसर का इलाज अक्सर महीनों तक चलता है और दवाएं हर महीने खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में एक दवा की कीमत में कुछ हजार रुपये की कमी भी महीनों के हिसाब से बड़ी बचत बन जाती है। चिकित्सकों का कहना है कि कीमत में कमी से इलाज को बीच में छोड़ने का दबाव कम हो सकता है और परिवार इलाज को लंबे समय तक जारी रख पाते हैं। साथ ही कीमतों में एकरूपता आने से अस्पताल और फार्मेसी के बिल में पारदर्शिता भी बढ़ने की उम्मीद है।
हालांकि विशेषज्ञ एक सावधानी भी बरतने को कहते हैं। कीमत में कमी का मतलब यह नहीं है कि हर दवा सस्ती हो गई है। महंगी पेटेंट दवाओं की कीमतें जस की तस हैं, इसलिए किसी मरीज को मिलने वाली राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके इलाज में कौन सी दवा, किस ब्रांड और किस पैक में इस्तेमाल हो रही है। इसके अलावा दवा की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर कोई सस्ती हुई दवा बाजार में आसानी से नहीं मिलती, तो कीमत में कमी का लाभ मरीज तक नहीं पहुंचेगा। इसलिए नियामक ने कंपनियों को उत्पादन जारी रखने और बिना पूर्व अनुमति के उत्पादन में कटौती न करने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि कमी या जमाखोरी की स्थिति न बने।
9 नवंबर से पहले और बाद में मरीज क्या करें
मरीजों और उनके परिजनों के लिए सबसे पहला कदम यह है कि वे अपनी दवा की सही पहचान करें। दवा का नाम, उसकी ताकत, खुराक का स्वरूप और पैक का आकार नोट करें। इसके बाद नियामक की वेबसाइट या फार्मा सही दाम ऐप पर उस दवा की संशोधित कीमत की जांच करें। अस्पताल या फार्मेसी से बिल लेते समय संशोधित अधिकतम खुदरा कीमत से मिलान करें और यह देखें कि बिल पर वही कीमत दर्ज है या नहीं।
अगर अस्पताल या फार्मेसी में संशोधित कीमत प्रदर्शित नहीं की गई है, तो मरीज को संशोधित मूल्य सूची मांगने का अधिकार है। नियामक के निर्देशों के अनुसार निर्माताओं, खुदरा विक्रेताओं और अस्पतालों को संशोधित कीमतें प्रदर्शित करनी हैं। किसी भी तरह की गड़बड़ी की स्थिति में राज्य औषधि नियंत्रक के पास शिकायत की जा सकती है। यह भी ध्यान रखें कि नई कीमतें 9 नवंबर 2026 से लागू होंगी, इसलिए उस तारीख से पहले पुरानी कीमत पर खरीदारी की तुलना नई कीमत से करना भ्रामक हो सकता है।
मध्य प्रदेश के मरीजों के लिए क्या खास है
यह मूल्य संशोधन पूरे देश में लागू होता है, इसलिए मध्य प्रदेश के मरीजों पर भी यही नियम लागू होंगे। भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, जबलपुर और प्रदेश के अन्य शहरों में इलाज करा रहे मरीजों को भी 9 नवंबर से संशोधित कीमतों का लाभ मिलना चाहिए। प्रदेश में कैंसर के इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या को देखते हुए यह राहत खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इलाज के लिए दूसरे शहरों की यात्रा, ठहरने और जांचों का खर्च भी परिवारों पर पड़ता है।
मध्य प्रदेश के मरीजों के लिए भी वही सावधानी लागू होती है जो देश के बाकी हिस्सों के लिए है। दवा खरीदते समय बिल को संभालकर रखें, पैक पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत से मिलान करें और अगर कोई अंतर दिखे तो फार्मेसी या अस्पताल से स्पष्टीकरण मांगें। इलाज से जुड़ा कोई भी बदलाव डॉक्टर की सलाह के बिना न करें। कीमत की खबर इलाज की सलाह नहीं है। दवा बदलना, खुराक बदलना या इलाज रोकना जैसे फैसले सिर्फ इलाज करने वाले चिकित्सक से चर्चा के बाद ही लेने चाहिए।
आगे क्या होगा
इस सूची को अंतिम नहीं माना जा सकता। कंपनियों की ओर से नई जानकारी आने पर सूची अद्यतन होती रहेगी। कुछ दवाओं की कीमतें आगे और घट सकती हैं, तो कुछ दवाओं के नए ब्रांड भी सूची में जुड़ सकते हैं। नियामक की निगरानी इस बात पर रहेगी कि 9 नवंबर के बाद संशोधित कीमतें वास्तव में लागू हो रही हैं या नहीं।
साथ ही महंगी पेटेंट दवाओं के मुद्दे पर बहस जारी रहेगी। मरीज संगठन और विशेषज्ञ लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि इन दवाओं की कीमतों पर भी प्रभावी नियंत्रण हो, ताकि इलाज की लागत सिर्फ कुछ ब्रांडों तक सीमित राहत न रह जाए। सरकार के सामने यह चुनौती होगी कि वह एक ओर दवाओं की कीमत कम रखे और दूसरी ओर कंपनियों के लिए उत्पादन को व्यवहार्य बनाए रखे, ताकि दवाएं बाजार से गायब न हों। आने वाले हफ्तों में 9 नवंबर के बाद की जमीनी स्थिति ही बताएगी कि यह राहत मरीजों के बिल तक कितनी पहुंची है।
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