भागीरथपुरा: गंदा पानी, गिनती की मौतें और सूरन-बाटी की सियासत

भागीरथपुरा में हर तरफ गंदे पानी का माहौल बना रहा। नलों से ज़हर निकलता रहा, अस्पतालों में मरीज बढ़ते रहे और मौतों का आंकड़ा भी थमता नजर नहीं आया। हालात इतने भयावह हो गए कि प्रदेश के मुखिया को स्वयं मौके पर पहुंचकर पीड़ितों से मिलना पड़ा।

लेकिन सवाल यह है कि जब लोग जान बचाने की जंग लड़ रहे थे, तब जिम्मेदारों की प्राथमिकताएं क्या थीं?

राजनीतिक गलियारों में इन दिनों चर्चा किसी राहत कार्य की नहीं, बल्कि जलकार्य समिति के प्रभारी बबलू शर्मा की “सूरन-बाटी पार्टी” की हो रही है। कड़ाके की ठंड में गरमा-गरम दावत की तस्वीरें और किस्से सत्ता के गलियारों में गूंजते रहे, जबकि भागीरथपुरा में मातम पसरा रहा।

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस विभाग की जिम्मेदारी शुद्ध पानी पहुंचाने की है, उसी से जुड़े पदाधिकारी ऐशो-आराम की चर्चा में बने रहे। जनता सवाल पूछ रही है—
क्या प्रशासन की संवेदनशीलता अब सिर्फ कैमरों के सामने दिखने तक सीमित रह गई है?
क्या मौतों से ज्यादा अहम राजनीतिक मेल-मिलाप और दावतें हो गई हैं?

भागीरथपुरा का यह कांड सिर्फ गंदे पानी का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, जवाबदेही और संवेदना के सूख जाने का भी मामला बन चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *