नई दिल्ली ब्यूरो
कर्नाटक की श्रृंगेरी विधानसभा सीट से जुड़े मतगणना वीडियो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने 14 अक्टूबर 2026 को इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने बताया कि 2023 की मूल मतगणना का वीडियो नहीं मिल रहा है, जबकि मई 2026 की पुनर्गणना का वीडियो सुरक्षित है। अदालत ने इस जवाब पर नाराजगी जताई और आयोग के बहाने को रिपोर्टों के अनुसार “लचर बहाना” बताया। अदालत ने यह भी कहा कि यदि रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए तो प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है। इस मामले की अगली सुनवाई 15 फरवरी 2027 को होगी।
सुप्रीम कोर्ट में क्या सुनवाई हुई
14 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने श्रृंगेरी सीट से जुड़े मामले की सुनवाई की। इस पीठ में न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा शामिल थे। सुनवाई का मुख्य विषय 2023 की मतगणना का वीडियो था, जो चुनाव आयोग के अनुसार अब नहीं मिल रहा है।
इस तरह के मामलों में अदालत का काम यह देखना होता है कि चुनाव प्रक्रिया के रिकॉर्ड सुरक्षित हैं या नहीं, और क्या मतगणना नियमानुसार हुई थी। वीडियो रिकॉर्ड इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इससे यह देखा जा सकता है कि मतगणना के दौरान क्या हुआ था। जब आयोग ने बताया कि मूल मतगणना का वीडियो नहीं मिल रहा है, तो अदालत ने इस पर गंभीर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान अदालत का रुख सख्त नजर आया।
चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने बताया कि 2023 की मूल मतगणना का वीडियो अब खोजने पर नहीं मिल रहा है, यानी वह ट्रेस नहीं हो रहा है। आयोग ने यह भी बताया कि मई 2026 में हुई पुनर्गणना का वीडियो सुरक्षित है।
आयोग के इस जवाब से दो अलग-अलग स्थितियां सामने आईं। एक ओर, पुरानी मतगणना का वीडियो गायब बताया गया। दूसरी ओर, बाद में हुई पुनर्गणना का वीडियो सुरक्षित बताया गया। अदालत के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण था कि जब बाद की प्रक्रिया का रिकॉर्ड सुरक्षित है, तो पहले की प्रक्रिया का रिकॉर्ड कैसे गायब हो गया। आयोग के जवाब से अदालत संतुष्ट नहीं हुई। इसी वजह से अदालत ने आयोग के बहाने को लचर बताया।
अदालत ने क्यों लगाई फटकार
रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने चुनाव आयोग के बहाने को “लचर बहाना” बताया। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि एक संवैधानिक संस्था अपने ही रिकॉर्ड कैसे खो सकती है। इस टिप्पणी का अर्थ यह है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था से रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की सबसे अधिक अपेक्षा की जाती है।
मतगणना का वीडियो केवल एक फाइल नहीं है। वह चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता का एक सबूत माना जाता है। यदि ऐसा रिकॉर्ड गायब हो जाता है, तो उससे चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठ सकते हैं। अदालत की फटकार इसी चिंता को दर्शाती है। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि यदि रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए तो प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि यदि आयोग रिकॉर्ड नहीं दे पाता, तो अदालत उस स्थिति को आयोग के विरुद्ध मान सकती है।
श्रृंगेरी सीट का विवाद क्या है
यह पूरा मामला कर्नाटक की श्रृंगेरी विधानसभा सीट से जुड़ा है। 2023 के चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के टी. डी. राजेगौड़ा ने भाजपा के डी. एन. जीवराज को 201 मतों से हराया था। यह अंतर बहुत कम था। ऐसे कम अंतर वाले चुनावों में मतगणना की हर प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रखी जाती है।
चुनाव के बाद भाजपा उम्मीदवार डी. एन. जीवराज ने परिणाम को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उन्होंने मतगणना की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इसके बाद मामला अदालतों में आगे बढ़ा और पुनर्गणना तक पहुंचा। यही वजह है कि यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। इस सीट का विवाद केवल एक चुनाव परिणाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मतगणना की प्रक्रिया और उसके रिकॉर्ड की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
पुनर्गणना में क्या हुआ
अप्रैल 2026 में उच्च न्यायालय ने 279 अस्वीकृत डाक मतपत्रों की पुनर्गणना का आदेश दिया था। डाक मतपत्र वे मतपत्र होते हैं, जो डाक के माध्यम से मतदान करने वाले मतदाताओं के होते हैं। इन मतपत्रों की गिनती को लेकर अक्सर विवाद होता है, क्योंकि इनकी वैधता और अस्वीकृति के नियमों को लेकर सवाल उठते हैं।
आरोप है कि मतगणना अधिकारी ने उच्च न्यायालय के आदेश से आगे जाकर 562 वैध मतपत्रों पर भी पुनर्विचार किया। यह आरोप राजेगौड़ा की ओर से लगाया गया है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह एक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं। इसके बाद 3 मई 2026 को जीवराज को विजेता घोषित कर दिया गया। यानी पुनर्गणना के बाद परिणाम बदल गया। पहले राजेगौड़ा विजेता थे, पुनर्गणना के बाद जीवराज को विजेता घोषित किया गया। इसी बदलाव ने विवाद को और बढ़ा दिया।
राजेगौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों किया
पुनर्गणना के बाद परिणाम बदलने पर टी. डी. राजेगौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना है कि मतगणना अधिकारी ने उच्च न्यायालय के आदेश से आगे जाकर काम किया। उनके अनुसार, उच्च न्यायालय ने केवल 279 अस्वीकृत डाक मतपत्रों की पुनर्गणना का आदेश दिया था, लेकिन अधिकारी ने 562 वैध मतपत्रों पर भी पुनर्विचार किया। यह उनकी ओर से लगाया गया आरोप है।
सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 के अंतरिम आदेश के अनुसार राजेगौड़ा को विधायक बने रहने दिया है। इसका अर्थ यह है कि अंतिम फैसला आने तक राजेगौड़ा विधायक के रूप में बने रहेंगे। अंतरिम आदेश का अर्थ यह नहीं है कि मामला समाप्त हो गया है। इसका अर्थ केवल यह है कि अंतिम निर्णय तक मौजूदा स्थिति बनी रहेगी। इस मामले में अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है।
अगली सुनवाई में क्या होगा
इस मामले की अगली सुनवाई 15 फरवरी 2027 को होगी। तब तक चुनाव आयोग को रिकॉर्ड पेश करने का अवसर दिया गया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए तो प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
अगली सुनवाई में सबसे पहले यही देखा जाएगा कि क्या आयोग ने 2023 की मूल मतगणना का वीडियो या उससे जुड़े रिकॉर्ड पेश किए हैं या नहीं। यदि रिकॉर्ड पेश किए जाते हैं, तो अदालत उनकी जांच करेगी। यदि रिकॉर्ड पेश नहीं किए जाते, तो अदालत प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने पर विचार कर सकती है। इस मामले का परिणाम न केवल श्रृंगेरी सीट के लिए, बल्कि चुनाव प्रक्रिया में रिकॉर्ड की सुरक्षा को लेकर भी एक महत्वपूर्ण संदेश दे सकता है। इसलिए इस मामले पर आगे भी नजर रहेगी।
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