शनि और राहु-केतु को अनावश्यक रूप से बदनाम किया गया है :वेदांग वार्ता में मंथन

महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति महामहोपाध्याय

इंदौर। ज्योतिष का उद्देश्य भय या भ्रम फैलाना नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन देना है। दक्षिणा के आधार पर पत्रिका देखना या परामर्श तय करना ज्योतिष की मूल भावना के विरुद्ध है। यह बात नक्षत्र कुटी के तत्वावधान में प्रेस क्लब इंदौर में आयोजित एक दिवसीय वेदांग वार्ता में प्रमुख रूप से सामने आई।

कार्यक्रम में ज्योतिषाचार्य डॉ. गिरीश व्यास ने कहा कि आज ज्योतिष के नाम पर अनेक भ्रांतियाँ फैलाई जा रही हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है। वेदांग के साथ ज्योतिष का समन्वय ही व्यक्ति को जीवन की दशाओं और गोचर का सही अर्थ समझा सकता है। हर ग्रह-दशा केवल धन देने के लिए नहीं, कई बार धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक दिशा देने के लिए भी आती है।

कार्यक्रम के संरक्षक पं. योगेंद्र महंत ने कहा कि ज्योतिष ग्रहों के प्रभाव को बदलती नहीं, बल्कि व्यक्ति को मानसिक संबल देकर उनके दुष्प्रभाव को कम करने में सहायता करती है। पंचांग के अनुसार दैनिक जीवन चलाने से सामंजस्य और संतुलन बनता है।

मुख्य अतिथि, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति महामहोपाध्याय डॉ. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि शनि और राहु-केतु को अनावश्यक रूप से बदनाम किया गया है, जबकि मानव जीवन पर सबसे अधिक प्रभाव सूर्य और चंद्रमा का होता है। सूर्य आत्मा और चंद्रमा मन का कारक है—इनकी सुदृढ़ता से ही सफलता संभव है।

विनायक पाण्डेय (विभागाध्यक्ष, शासकीय संस्कृत महाविद्यालय) ने स्पष्ट कहा कि ज्योतिषी का कार्य निष्पक्ष परामर्श देना है—कोई पाँच रुपये दे या पाँच हजार, मार्गदर्शन समान होना चाहिए। वहीं मनीष शर्मा ने वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप सरल और व्यवहारिक उपायों पर जोर दिया, जो आम जन कर सकें।

कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. सुनील भार्गव ने की। देशभर से आए 150 से अधिक ज्योतिषाचार्य और विशेषज्ञों ने सहभागिता की। आयोजन को आचार्य गोपाल बैरागी और सहयोगियों का विशेष योगदान रहा।

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