अनुषठ चोहान इंदौर



भागीरथपुरा का जलकांड अब सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं रहा। यह सरकार, सिस्टम और जनप्रतिनिधियों—तीनों की सामूहिक नाकामी का सार्वजनिक पोस्टमार्टम बन चुका है। सरकार हर मंच से कार्रवाई की घोषणा करने में अव्वल है, लेकिन ज़मीन पर हालात जस के तस हैं। सवाल सीधा है—जब हर रिपोर्ट, हर बयान अधिकारीयों की लापरवाही की ओर इशारा कर रहा है, तो फिर दोषियों को हटाने में हिचक क्यों?
निरीक्षण हुए, सैंपल लिए गए, माइक पर ऐलान किए गए—लेकिन यह सब हादसे के बाद की रस्मअदायगी है। असल कसौटी तब होती है जब जिम्मेदारी तय करनी हो। जैसे ही कार्रवाई की बारी आती है, सिस्टम की रफ्तार अचानक सुस्त पड़ जाती है। आज हर सरकारी रिपोर्ट एक ही कहानी कह रही है—पाइपलाइन लीकेज, जानलेवा बैक्टीरिया, दबाई गई शिकायतें और जानबूझकर टाले गए वर्क ऑर्डर। फिर भी अफसर अब तक कुर्सियों से चिपके हुए हैं।

कटघरे में सिर्फ अफसर ही नहीं, जनप्रतिनिधि भी हैं। जिन पार्षदों ने घर-घर जाकर वोट मांगे, विकास का भरोसा दिया—वे तब कहां थे जब जनता गंदे पानी की शिकायत कर रही थी? क्या जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित है? क्या “विकास” का मतलब यही था कि नलों से ज़हर बहे और लोग दम तोड़ें?

इस बीच एक बड़ा प्रशासनिक संदेश जरूर गया—अपर मुख्य सचिव संजय दुबे को इंदौर में ही रोक दिया गया। मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया कि मामला अब हल्का नहीं है। निगरानी होगी, कार्रवाई भी होगी। लेकिन जनता पूछ रही है—क्या यह निगरानी सिर्फ फाइलों में होगी या जमीन पर भी किसी की जवाबदेही तय होगी?
राजनीतिक गलियारों में बयानबाज़ी चरम पर है। नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बिगड़े बोल चर्चा में हैं, जहां सवाल पूछने वाले पत्रकार को ही सुना दिया गया। दूसरी ओर, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भोपाल में सियासी आक्रामकता दिखाते हुए पीड़ितों के लिए एक करोड़ रुपये की सहायता राशि की मांग रख दी। कैमरे चालू हैं, बयान तेज हैं—लेकिन इलाज, मुआवजा और सजा का सवाल अब भी अनुत्तरित है।
विडंबना यह है कि जिस नए साल से लोगों को उम्मीद थी कि हालात बदलेंगे, उसी साल की शुरुआत भागीरथपुरा ने देशभर में इंदौर की बदनामी से करवाई। स्वच्छता के तमगों से सजा शहर अब कुछ समय तक दूषित पानी, बैक्टीरिया और मौतों के लिए पहचाना जाएगा।
भागीरथपुरा ने सिर्फ 14 जिंदगियां नहीं छीनीं, उसने पूरे सिस्टम की आत्मा पर सवाल खड़ा कर दिया है।
अब सवाल सीधा और आख़िरी है—
अब देखना यह है कि सरकार जवाब देगी
या फिर हमेशा की तरह—सिर्फ घोषणा।
