इंदौर ब्यूरो।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ — देश की वह अद्वितीय, मातृवत संस्था जिसने संस्कारों के साथ निस्वार्थ राष्ट्रसेवा के पूरे 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। शताब्दी वर्ष अब अपने समापन की ओर है, और इस ऐतिहासिक समापन का गौरवशाली साक्षी बनने जा रहा है मालवा प्रांत। समापन कार्यक्रम इंदौर में होगा — और इंदौर को ही संघ की वार्षिक अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक की मेजबानी का सम्मान भी मिला है। मध्यप्रदेश के लिए, और विशेष रूप से मालवा प्रांत के लिए, इससे बड़ा गौरव और क्या हो सकता है।
आज, रविवार 25 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के अवसर पर इंदौर विभाग का ऐतिहासिक पथ संचलन शताब्दी वर्ष के इसी गौरव का जीवंत प्रतीक बना। इंदौर महानगर की 34 नगरों की 345 बस्तियों के मुख्य आंतरिक मार्गों पर बस्तीशः पथ संचलन हुआ, जिसमें लगभग एक लाख स्वयंसेवक कदमताल करते हुए निकले। हर मार्ग 3-4 किलोमीटर का था — महानगर भर में कुल लगभग 1200 किलोमीटर। निवासियों ने मार्ग में पुष्पवर्षा से स्वागत किया। मार्च से पहले सभी एकत्रीकरण स्थलों पर व्यायाम-योग और बौद्धिक भी हुए।
संस्कार और निस्वार्थ राष्ट्रसेवा के 100 वर्ष — एक अद्वितीय संस्था
1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 2025 में संघ ने अपने 100 वर्ष पूरे किए — शताब्दी वर्ष 2025-26 में मनाया जा रहा है।
शाखा संस्कारों की पाठशाला रही — खेल, व्यायाम, गीत और बौद्धिक के माध्यम से चरित्र-निर्माण। मातृवत संस्था की तरह संघ ने पीढ़ियों को राष्ट्रहित में जीने की प्रेरणा दी।
100 वर्षों में सेवा के अनगिनत आयाम — प्राकृतिक आपदाओं में राहत, वंचित वर्गों के उत्थान में योगदान, और राष्ट्र के प्रति समर्पण। कोई बढ़ा-चढ़ाकर दावा नहीं — बस निस्वार्थ सेवा का सिलसिला।
डॉ. हेडगेवार जी — नींव रखने वाले संस्थापक

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। वे संघ के प्रथम सरसंघचालक थे।
उनका विचार था व्यक्ति-निर्माण — प्रतिदिन की शाखा के माध्यम से चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्रभक्त नागरिक तैयार करना। इसी बुनियाद पर 100 वर्षों का भव्य भवन खड़ा हुआ।
गुरुजी (म. स. गोलवलकर) — संघ को राष्ट्रव्यापी विस्तार देने वाले द्वितीय सरसंघचालक
संघ के इतिहास में गुरुजी का स्थान अद्वितीय है। माधव सदाशिव गोलवलकर — जिन्हें सभी गुरुजी के नाम से जानते हैं — 1940 में डॉ. हेडगेवार जी के बाद संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने और 1973 तक, तीन दशक से अधिक समय तक, संघ का नेतृत्व किया।
गुरुजी के नेतृत्व में संघ का राष्ट्रव्यापी विस्तार हुआ। उन्होंने संगठन को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया और शाखा-पद्धति को सुदृढ़ किया। संस्कार और अनुशासन पर उनका जोर आज भी संघ की कार्यपद्धति की आत्मा है।
गुरुजी का व्यक्तित्व ही संघ के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा — सादगी, निस्वार्थता और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण। उनके कार्यकाल में संघ समाज के हर वर्ग तक पहुंचा और राष्ट्रसेवा के विविध आयाम विकसित हुए।
आज जब संघ शताब्दी वर्ष मना रहा है, तो गुरुजी के योगदान की याद आना स्वाभाविक है — क्योंकि 100 वर्षों की इस यात्रा का सबसे लंबा और निर्णायक अध्याय उन्हीं के नेतृत्व में लिखा गया।

मोहन भागवत जी — शताब्दी वर्ष का नेतृत्व कर रहे सरसंघचालक
2009 में मोहन भागवत जी संघ के छठे सरसंघचालक बने — 21 मार्च 2009 से उन्होंने पदभार संभाला। वर्तमान में वे संघ का नेतृत्व कर रहे हैं, और शताब्दी वर्ष का नेतृत्व भी उन्हीं के मार्गदर्शन में हो रहा है।
उनके नेतृत्व में संघ ने समकालीन चुनौतियों के बीच अपनी जड़ों — संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रसेवा — को और मजबूत किया है। शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का सूत्रपात और समापन उन्हीं की अगुवाई में हो रहा है।

आज की पीढ़ी के नाम — तीनों युगद्रष्टाओं के विचारों की विरासत
डॉ. हेडगेवार जी का व्यक्ति-निर्माण का विचार, गुरुजी का राष्ट्रव्यापी संगठन और संस्कारों पर जोर, और मोहन भागवत जी का समकालीन मार्गदर्शन — ये तीनों आज की पीढ़ी के लिए प्रासंगिक हैं।
आज का पथ संचलन इसका जीवंत प्रमाण है — लगभग एक लाख स्वयंसेवक, जिनमें बड़ी संख्या में युवा हैं, कदमताल करते हुए निकले। संस्कार, निस्वार्थ सेवा, राष्ट्रीय हित और एकता — ये विचार आज की पीढ़ी तक पहुंच रहे हैं।
चरैवेति — निरंतर अपने ध्येय-पथ पर संकल्पित भाव से चलते रहना — यही आज की पीढ़ी के लिए संदेश है।
इंदौर में ऐतिहासिक पथ संचलन — 345 बस्तियों में गूंजी कदमताल
बस्तीशः पथ संचलन में इंदौर महानगर के 34 नगरों की 345 बस्तियों के मुख्य आंतरिक मार्ग शामिल थे। लगभग एक लाख स्वयंसेवकों ने अनुशासित कदमताल से शहर को राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग दिया।
हर मार्ग 3-4 किलोमीटर का था — महानगर भर में कुल लगभग 1200 किलोमीटर का संचलन। मार्ग में निवासियों ने पुष्पवर्षा से स्वयंसेवकों का स्वागत किया। भारत माता के जयघोष से वातावरण गूंज उठा।
मार्च से पहले सभी एकत्रीकरण स्थलों पर व्यायाम-योग और बौद्धिक हुए — यही संघ की परंपरा है, शारीरिक अनुशासन के साथ वैचारिक स्पष्टता।

बौद्धिक में क्या कहा — राजमोहन जी और श्रीनाथ गुप्ता जी के संदेश
राऊ में मालवा प्रांत प्रचारक राजमोहन जी ने कहा कि स्वयंसेवकों को सभी विषमताओं को दूर कर समरसता स्थापित करने का संकल्प लेना चाहिए। लक्ष्य केवल संगठनात्मक विस्तार नहीं, बल्कि समरस समाज की स्थापना है।
ओल्ड पलासिया में प्रांत सह कार्यवाह श्रीनाथ गुप्ता जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति भिन्नताओं को विविधता के रूप में देखती है — विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है, इसलिए भारत विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है। 100 वर्षों के समरसता और एकता के संस्कार भारत की विश्व को देन हैं।
प्रदेश का योगदान — शताब्दी समापन का गौरवशाली साक्षी बनेगा मालवा प्रांत
इंदौर को संघ की वार्षिक अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक की मेजबानी का सम्मान मिला है — देश भर से शीर्ष पदाधिकारी इसमें शामिल होंगे।
इंदौर विभाग में शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की श्रृंखला चल रही है और समापन की तैयारियां चरम पर हैं। 28 अक्टूबर को शाम 4:30 बजे डेली कॉलेज में भव्य “चरैवेति एकत्रीकरण” शताब्दी वर्ष के समापन समारोह के रूप में होगा — जिसकी तैयारियां एक महीने से चल रही हैं।
यह केवल इंदौर शहर नहीं, पूरा मालवा प्रांत है जो शताब्दी समापन का गौरवशाली साक्षी बनेगा — दशकों के समर्पण का यह फल मालवा के हर स्वयंसेवक के लिए गौरव की बात है।
आगे क्या — चरैवेति: निरंतर ध्येय-पथ पर चलते रहना
चरैवेति का अर्थ है — निरंतर अपने ध्येय-पथ पर संकल्पित भाव से चलते रहना। समापन अगले संकल्प की शुरुआत है।
मालवा के स्वयंसेवकों के लिए दोहरा गौरव है — आज का एक लाख का पथ संचलन और समापन समारोह का साक्षी बनना। संस्कार और निस्वार्थ राष्ट्रसेवा के 100 वर्ष — यह केवल अतीत की गाथा नहीं, भविष्य का संकल्प है। चरैवेति!
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