मुंबई ब्यूरो। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि भारत में राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं हैं — दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का प्रयोजन धर्म है, और धर्म का काम राष्ट्र की धारणा करना है।
सरसंघचालक 2 अक्तूबर को मुंबई के बोरीवली में ‘ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप’ के 14वें वार्षिक अधिवेशन को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर वरिष्ठ जैन आचार्य और अनेक गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे।
राष्ट्र दुर्बल तो धर्म संकट में
अपने संबोधन में डॉ. भागवत ने कहा, “हमारा राष्ट्र धर्म के लिए है। हमारे यहाँ राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का प्रयोजन धर्म है और धर्म का उपयोग होता है राष्ट्र की धारणा के लिए। दोनों परस्परावलंबी हैं। एक है तो दूसरा भी है, एक नहीं तो दूसरा भी नहीं।”
उन्होंने आगे कहा कि अगर राष्ट्र दुर्बल हो गया तो धर्म संकट में आ जाएगा, और धर्माचरण दुर्बल हो गया तो राष्ट्र नीचे आ जाएगा। इसीलिए दोनों को सही रूप में साथ-साथ चलाना हमारा कर्तव्य है।
ज्ञान परंपरा में दुनिया की चुनौतियों का हल
सरसंघचालक ने कहा कि आज दुनिया तरह-तरह के विरोधाभासों, संघर्षों और चरमपंथी विचारधाराओं के कारण अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे समय में मानवता का मार्गदर्शन करने की क्षमता भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में है, और इसीलिए दुनिया आज आशा की दृष्टि से भारत की ओर देख रही है।
उन्होंने कहा कि भारत ने अपने ज्ञान का प्रसार कभी किसी पर आक्रमण करके या बलपूर्वक धर्मांतरण कराकर नहीं किया। मानव कल्याण की निःस्वार्थ भावना से भारत ने अपना ज्ञान दुनिया को दिया — यही भारत की ज्ञान परंपरा की खास पहचान है।
ग्रंथों और संतों की शिक्षाओं में मानवता की दिशा
डॉ. भागवत ने कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता के साथ-साथ जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब जैसे ग्रंथों में मानवता को दिशा देने वाला व्यापक ज्ञान समाहित है। संतों की शिक्षाओं से मानव कल्याण, समरसता और सेवाभाव का संदेश मिलता है।
उनके अनुसार इस ज्ञान संपदा की आज संपूर्ण विश्व को आवश्यकता है, और इसे सहेजकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के प्रति हमारा कर्तव्य है।

फोटो: तेलंगाना टुडे
