
लाखों उम्मीदों और असहाय पीड़ाओं का साक्षी यह विशाल अस्पताल। यहाँ हर दिन सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों लोग इलाज की तलाश में आते हैं कोई दर्द से कराहता हुआ, कोई डर और अनिश्चितता में चुपचाप बैठा। कई ऐसे भी होते हैं जो न पढ़-लिख पाते हैं, न अपनी बीमारी समझ पाते हैं। हाथ में पर्चा होता है, पर दिशा नहीं होती।
उनकी आँखों में सवाल होते हैं, होंठों पर मौन। डॉक्टर ने जाँच लिख दी है, पर अब कहाँ जाना है यह भी नहीं पता। भीड़ में पूछने की हिम्मत टूट जाती है। अस्पताल बड़ा है, व्यवस्थाएँ विशाल हैं, लेकिन एक बेसहारा इंसान के लिए सहारा अक्सर छोटा पड़ जाता है।

तभी कहीं से एक शांत स्वर आता है
“चिंता मत कीजिए, हम हैं।”
यहीं से मरीज की भटकन रुक जाती है।
यह स्वर किसी अधिकारी का नहीं, किसी रिश्तेदार का भी नहीं यह सेवा भारती के कार्यकर्ता का स्वर होता है। बिना किसी औपचारिकता के, बिना सवाल-जवाब के, केवल अपनत्व के साथ।

सेवा भारती के कार्यकर्ता मरीज को सही विभाग तक ले जाते हैं, डॉक्टर से संवाद कराते हैं, जाँच प्रक्रिया समझाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उसे समय पर और उचित इलाज मिले। यदि भर्ती की आवश्यकता हो, तो फॉर्म भरने से लेकर लाइन, वार्ड और बेड तक हर कदम पर वह कार्यकर्ता साथ रहता है, बिल्कुल किसी अपने की तरह।
इलाज के दौरान भी यह साथ नहीं छूटता।
दवा मिली या नहीं पूछा जाता है।
जाँच समय पर हुई या नहीं देखा जाता है।
रात में दर्द बढ़ा या नहीं सुना जाता है।
और जब मरीज के पास कोई अपना नहीं होता, तब सेवा भारती केवल एक संस्था नहीं रहती वह परिवार बन जाती है। भोजन, वस्त्र, स्वच्छता, ढांढस और विश्वास
सब कुछ सेवा के रूप में मिलता है।
इलाज पूरा होने के बाद भी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। मरीज को सुरक्षित उसके घर तक पहुँचाया जाता है
मानो यह कहने के लिए,
“अब आप अकेले नहीं हैं।”
महाराजा यशवंत राव अस्पताल की अनंत भीड़ में, सेवा भारती के सदस्य उन हाथों की तरह हैं जो थाम लेते हैं
उन लोगों का, जो चल तो सकते हैं, पर रास्ता नहीं जानते। यह सेवा न शोर मचाती है, न प्रचार चाहती है—यह बस चुपचाप मानवता को जीवित रखती है।
पिछले 8 वर्षों से सेवा भारती इस अस्पताल के सहारा वार्ड में निरंतर और निःस्वार्थ सेवा कर रही है। यह वार्ड उन मरीजों के लिए होता है जो बेसहारा हैं
जिनका कोई परिजन नहीं, या जो अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में इलाज के लिए भर्ती होते हैं।
संस्था और अस्पताल द्वारा इन्हें भोजन, वस्त्र, दवाइयाँ, स्वच्छता सामग्री और मानवीय सहयोग प्रदान किया जाता है। संवाद, संवेदनशीलता और अपनत्व सेवा भारती की कार्यशैली का मूल है, जो मरीजों को मानसिक संबल भी देता है।
इस सेवा के पीछे चेहरे हैं जिनकी कहानियाँ स्वयं में प्रेरणा हैं।
हमारी मुलाकात शैलेंद्र जी कोठारी से हुई। उन्होंने बताया कि लगभग 90 वर्षों से चला आ रहा पारिवारिक व्यापार बंद करने के बाद उन्हें जीवन का सच्चा सुख इसी निःस्वार्थ सेवा में मिला। सुबह से अस्पताल में लगे रहना, किसी अनजान की पीड़ा को अपनी पीड़ा मान लेना
यही अब उनका जीवन है।
यहीं मिले बीएसएनएल से सेवानिवृत्त मधुसूदन तिवारी जी। उन्होंने इस सेवा को उतना ही पुनीत और पावन माना, जितना कोई धार्मिक अनुष्ठान। आज वे सेवा भारती के इस प्रकल्प के प्रभारी हैं और पूरे समर्पण के साथ इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। साथ ही इस प्रकल्प में रामप्रसाद सांवलिया जो एम. वाय. हॉस्पिटल की सारी व्यवस्थाओं को भलीभांति प्रकार से जानते है उनके जैसे और भी कार्यकर्ता इस पुनीत सेवाकार्य से जुड़े है, जो पूरी निष्ठा के साथ अपने दायित्व को निभाते है ।
जब हम सहारा वार्ड में पहुँचे, तो वहाँ की आँखें हमें देखने लगीं मानो पूछ रही हों,
“क्या आप हमारे अपने हैं?”
हर आँख में एक उम्मीद थी कि कोई है, जो हमें भी अपना समझे।
और सच में कोई है।
सेवा भारती और उसकी पूरी टीम जिस निःस्वार्थ भाव से यह कार्य कर रही है, वह केवल सेवा नहीं
समाज के लिए एक जीवंत संदेश है। यह बताता है कि जब संवेदना संगठित प्रयास बन जाती है, तो व्यवस्था भी मानवीय हो जाती है।
सेवा भारती का यह कार्य समाज के लिए एक प्रेरणादायी उदाहरण है जो सिखाता है कि सेवा ही सच्चा धर्म है।
